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रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं ग्रामीण

Updated at : 06 Feb 2020 12:44 AM (IST)
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रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं ग्रामीण

महुआडांड़ : रोजगार की तलाश में प्रखंड के विभिन्न गांवों के ग्रामीण दूसरे राज्यों के बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. सुदूर गांवों में रहनेवाले कम पढ़े-लिखे युवा ही नहीं,प्रखंड मुख्यालय में रहनेवाले शिक्षित युवा भी अच्छी कमाई की उम्मीद में घर छोड़ कर परदेश का रूख कर रहे हैं. बुधवार को प्रखंड […]

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महुआडांड़ : रोजगार की तलाश में प्रखंड के विभिन्न गांवों के ग्रामीण दूसरे राज्यों के बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. सुदूर गांवों में रहनेवाले कम पढ़े-लिखे युवा ही नहीं,प्रखंड मुख्यालय में रहनेवाले शिक्षित युवा भी अच्छी कमाई की उम्मीद में घर छोड़ कर परदेश का रूख कर रहे हैं. बुधवार को प्रखंड मुख्यालय के पंचायत दूरूप गांव के बरदौनी, साले व बसरिया के रघु मुंडा, बिरजू मुंडा, बेंजन कुजूर, उमेश कुजूर एवं समीर पन्ना काम की तलाश में ओड़िसा पलायन कर गये.

हाल के दिनों में प्रखंड से सैकड़ों युवा यूपी, दिल्ली, उड़ीसा व केरल आदि शहरों के लिए घर से निकल चुके हैं. वहीं पठारी क्षेत्र के गांवों में युवतियों को बहला फुसलाकर उन्हें दिल्ली ले जाकर काम पर लगाया जा रहा है. ऐसे गिरोह यहां सक्रिय हैं जो अच्छे काम का प्रलोभन दे कर और अभिभावकों को हड़िया व दारू पिलाकर गुमराह कर रहे हैं और उनके घर की लड़कियों को बाहर ले जा रहे हैं.

मनरेगा की योजनाओं में निर्धारित समय में मजदूरी नहीं मिलने, बिचौलियों के द्वारा कम मजदूरी करने, भुगतान की जटिल प्रक्रिया व भ्रष्टाचार ग्रामीण क्षेत्रों के मजदूरों का पलायन रोकने में पूरी तरह विफल साबित हो रहा है. मजदूर मनरेगा की काम से तौबा कर परदेश जाकर मजदूरी सहित कोई अन्य काम धंधा तलाश करना ही बेहतर समझ रहे हैं.

ग्रामीण कहते हैं कि तीन चार वर्षों से मनरेगा के द्वारा पहले जैसा काम नहीं मिलता है और ना ही समय से पैसा का भुगतान होता है. रघु मुंडा ने बताया कि पहले मनरेगा में काम करते थे 170 रुपये मिलता था. वह भी महीनों का इंतजार करते थे तब. अब बाहर जाते हैं, आठ घंटे का 300 मिलता है. तीन-चार महीने में लेबर कुली का काम कर अच्छा खासा पैसा कमा लेते हैं.

उमेश कुजूर ने कहा हमें बाहर जाकर काम करने का शौक नहीं है. परिवार छोड़ कर बाहर जाते हैं. हम भी चिंता में रहते हैं और घर के लोग भी चिंता में रहते हैं. प्रशासन के द्वारा पलायन रोकने की दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं किया जा रहा है.

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