'जो प्यास बुझाने निकले हैं, उनके ही दफ्तर में सूख गए इंतजाम!' नारायणपुर प्रखंड कार्यालय में बदहाली

जामताड़ा के नारायणपुर का प्रखंड कार्यालय. इनसेट में बाईं ओर खराब पड़ा ठंडे पानी की मशीन और दाईं ओर बदहाल शौचालय. फोटो: प्रभात खबर
जामताड़ा के नारायणपुर प्रखंड कार्यालय की व्यवस्था इन दिनों चर्चा में है, जहां गर्मी में कर्मचारी और ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं के लिए परेशान हैं। पीने के पानी से लेकर शौचालय तक की व्यवस्था चरमराई हुई है, जिससे 'चिराग तले अंधेरा' वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।
जामताड़ा से निकेश कुमार की रिपोर्ट
Jamtara News: झारखंड के जामताड़ा जिले के नारायणपुर प्रखंड सह अंचल कार्यालय की बदहाल व्यवस्था इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है. जिस कार्यालय से पूरे प्रखंड की विकास योजनाओं की निगरानी होती है और जहां से पेयजल, स्वच्छता एवं जनकल्याण से जुड़े निर्देश जारी किए जाते हैं, उसी कार्यालय में कर्मचारी और आम लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए परेशान हैं. पीने के पानी से लेकर शौचालय तक की व्यवस्था चरमराई हुई है. हालात ऐसे हैं कि भीषण गर्मी में कर्मचारी घर से पानी लाने को मजबूर हैं, जबकि ग्रामीणों को भी कार्यालय आने पर पीने के पानी के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता है.
वाटर फिल्टर खराब, पेयजल टंकी भी बनी शोपीस
कार्यालय परिसर में लगाया गया वाटर फिल्टर लंबे समय से खराब पड़ा हुआ है. इसके कारण कर्मचारियों और आम लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है. वहीं परिसर में बनी पेयजल टंकी भी वर्षों से अनुपयोगी पड़ी है. कर्मचारियों का कहना है कि टंकी की नियमित सफाई तक नहीं होती, जिससे उसका उपयोग संभव नहीं है. नतीजतन अधिकांश कर्मचारी रोजाना अपने घर से पानी की बोतल लेकर कार्यालय आते हैं. जिनके पास पानी नहीं होता, उन्हें दिनभर चापाकल के सहारे प्यास बुझानी पड़ती है.
ग्रामीणों को भी उठानी पड़ रही परेशानी
प्रखंड कार्यालय में प्रतिदिन विभिन्न योजनाओं और प्रमाण पत्रों से जुड़े कार्यों के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचते हैं. लेकिन यहां पीने के पानी की समुचित व्यवस्था नहीं होने से उन्हें भी काफी परेशानी होती है. कई बार लोगों को आसपास पानी की तलाश करनी पड़ती है. गर्मी के मौसम में यह समस्या और गंभीर हो जाती है. स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस कार्यालय में रोज सैकड़ों लोग आते हैं, वहां कम से कम स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था तो होनी ही चाहिए.
शौचालय की हालत भी बेहद खराब
कार्यालय परिसर में बने शौचालय की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है. नियमित साफ-सफाई नहीं होने के कारण वहां से तेज दुर्गंध उठती रहती है. कर्मचारियों का कहना है कि शौचालय के सामने से गुजरना भी मुश्किल हो जाता है. ऐसे माहौल में उसका उपयोग करना किसी चुनौती से कम नहीं है. साफ-सफाई की अनदेखी के कारण कर्मचारियों के साथ-साथ कार्यालय आने वाले लोगों को भी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है.
स्वच्छता अभियान चलाने वाला कार्यालय खुद बदहाल
विडंबना यह है कि इसी प्रखंड कार्यालय से गांव-गांव में पेयजल संकट दूर करने और स्वच्छता व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए योजनाओं की निगरानी की जाती है. अधिकारी विभिन्न पंचायतों में जाकर लोगों की समस्याएं सुनते हैं और ओडीएफ समेत अन्य स्वच्छता अभियानों की समीक्षा करते हैं. लेकिन जिस कार्यालय से इन योजनाओं का संचालन हो रहा है, वहीं की बुनियादी व्यवस्था बदहाल है. यह स्थिति "चिराग तले अंधेरा" वाली कहावत को पूरी तरह चरितार्थ करती नजर आती है.
कर्मचारियों में नाराजगी, लेकिन खुलकर बोलने से परहेज
कार्यालय के कई कर्मचारी मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट बताए जा रहे हैं. उनका कहना है कि लंबे समय से पेयजल और शौचालय जैसी मूलभूत समस्याएं बनी हुई हैं, लेकिन समाधान की दिशा में ठोस पहल नहीं हो रही है. हालांकि अधिकांश कर्मचारी उच्चाधिकारियों के भय या प्रशासनिक कारणों से खुलकर कुछ भी कहने से बच रहे हैं. उनका मानना है कि यदि कार्यालय की बुनियादी सुविधाओं में सुधार हो जाए तो कर्मचारियों के साथ-साथ आम लोगों को भी राहत मिलेगी.
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व्यवस्था सुधारने की उठ रही मांग
स्थानीय लोगों और कर्मचारियों का कहना है कि प्रखंड कार्यालय की यह स्थिति प्रशासन के लिए गंभीर चिंता का विषय होनी चाहिए. जिस कार्यालय से जनता की समस्याओं के समाधान की उम्मीद की जाती है, वहां खुद मूलभूत सुविधाओं का अभाव होना कई सवाल खड़े करता है. अब लोगों की मांग है कि खराब पड़े वाटर फिल्टर और पेयजल टंकी को जल्द दुरुस्त किया जाए, शौचालय की नियमित सफाई सुनिश्चित हो और कार्यालय परिसर में स्वच्छ एवं बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, ताकि कर्मचारी और आम नागरिक दोनों सम्मानजनक वातावरण में अपने कार्य कर सकें.
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लेखक के बारे में
By कुमार विश्वत सेन
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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