भगवान का स्मरण जीवन के अंतिम समय का सर्वोत्तम कर्म : शास्त्री महाराज

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भगवान का स्मरण जीवन के अंतिम समय का सर्वोत्तम कर्म : शास्त्री महाराज

कुंडहित. सिंहवाहिनी मंदिर परिसर में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा जारी है.

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सिंहवाहिनी मंदिर परिसर में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा जारी प्रतिनिधि, कुंडहित. सिंहवाहिनी मंदिर परिसर में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा जारी है. इसके तृतीय दिन वृंदावन धाम के बाल कथावाचक कोस्तभ वल्लभ शास्त्री जी महाराज ने सृष्टि के महत्व, ध्रुव चरित्र, प्रह्लाद चरित्र, अजामिल उपाख्यान, भगवत के दस लक्षण तथा राजा परीक्षित के द्वितीय प्रश्न पर प्रकाश डाला. सृष्टि के महत्व पर कहा कि यह ईश्वर की शक्ति, बुद्धिमत्ता और दिव्य गुणों का प्रतीक है, जो जीवन का आधार होने के साथ-साथ परमात्मा को जानने का माध्यम भी है. राजा परीक्षित के प्रश्न मृत्यु के समीप मनुष्य को क्या करना चाहिए, क्या सुनना और जपना चाहिए का उत्तर देते हुए शुकदेव जी के उपदेशों का उल्लेख किया. कहा कि भगवान के नाम का कीर्तन, स्मरण और कथा श्रवण ही अंतिम समय का सर्वोत्तम कर्म है, जो मनुष्य को मृत्यु के भय से मुक्त करता है. ध्रुव महाराज के चरित्र का वर्णन करते हुए बताया कि मात्र पांच वर्ष की आयु में कठोर तपस्या कर ध्रुव ने भगवान को प्राप्त किया. इससे यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची निष्ठा और श्रद्धा से कोई भी व्यक्ति भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है. भक्त प्रह्लाद के प्रसंग में कहा कि विपरीत परिस्थितियों और अत्याचारों के बावजूद प्रह्लाद अपनी भक्ति से विचलित नहीं हुए और अंततः भगवान ने नरसिंह अवतार लेकर उनकी रक्षा की. उन्होंने बच्चों में संस्कार निर्माण पर जोर देते हुए कहा कि गर्भावस्था से ही भजन, कीर्तन और कथा का संस्कार दिया जाना चाहिए. माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को संतों की संगति में रखें. कथा के दौरान भजन-कीर्तन से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया.

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Jiyaram Murmu

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