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नहीं रहे डायन-बिसाही के खिलाफ कानूनी बिगुल फूंकने वाले प्रेमचंद, दुनिया को कहा अलविदा

Updated at : 20 Feb 2026 1:03 PM (IST)
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नहीं रहे डायन-बिसाही के खिलाफ कानूनी बिगुल फूंकने वाले प्रेमचंद, दुनिया को कहा अलविदा

1999 में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम लागू कराने में अहम भूमिका निभाने वाले प्रेमचंद. फोटो: प्रभात खबर

Premchand Death: डायन-बिसाही के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता प्रेमचंद का निधन हो गया. उन्होंने 1999 में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम लागू कराने में अहम भूमिका निभाई. जीवन भर अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष किया और अंतिम समय में अपनी देह दान कर समाज सेवा की मिसाल पेश की. पूरी खबर नीचे पढ़ें.

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जमशेदपुर से संजीव भारद्वाज की रिपोर्ट

Premchand Death: बिहार और झारखंड में अंधविश्वास की बेड़ियों में जकड़ी महिलाओं को सम्मान दिलाने के लिए अपना पूरा जीवन होम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता प्रेमचंद अब हमारे बीच नहीं रहे. टाटा मुख्य अस्पताल (टीएमएच) में पिछले 25 दिनों से जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे प्रेमचंद ने शुक्रवार सुबह नौ बजे अंतिम सांस ली. उनके जाने से समाज ने एक ऐसा योद्धा खो दिया है, जिसने ‘डायन’ शब्द के कलंक को मिटाने के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया था.

इमरजेंसी से जमशेदपुर तक: संघर्ष का सफर

प्रेमचंद की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं थी. सासाराम के कुदरा में जन्म हुआ, उच्च शिक्षा के लिए बनारस पहुंचे, लेकिन वहां इमरजेंसी आंदोलन की आग में कूद पड़े. पुलिस पीछे पड़ी तो छिपते-छिपाते जमशेदपुर पहुंचे. यहां नाम बदलकर झारखंड आंदोलन से जुड़ गए, लेकिन उनकी असली मंजिल समाज सुधार थी.

करनडीह की उस चीख ने बदल दी जिंदगी

साल 1991 में करनडीह में डायन के आरोप में पिता-पुत्र की हत्या और महिला को गांव से निकाले जाने की घटना ने उन्हें झकझोर कर रख दिया. रहा नहीं गया और वे इस कुप्रथा के खिलाफ मैदान में कूद पड़े. तब से महिलाओं के शोषण और इस घिनौने अपराध के खिलाफ उनका आंदोलन लगातार जारी रहा.

जब मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट ने पहुंचाया दुख

फ्री लीगल एड कमेटी की अगुवाई करते हुए उन्होंने इस मुद्दे को मानवाधिकार आयोग तक पहुंचाया. आयोग ने टीम भेजी, लेकिन रिपोर्ट आई कि डायन प्रथा जैसी कोई बात नहीं है. प्रेमचंद दुखी हुए, पर मायूस नहीं. 1995 में कुचाई में जब एक ही परिवार के 7 लोगों की हत्या हुई, तब सिंहभूम के तत्कालीन उपायुक्त अमित खरे के सहयोग से यह लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंची.

विरासत: 20 अक्टूबर 1999 की ऐतिहासिक जीत

प्रेमचंद के अटूट संघर्ष का ही परिणाम था कि 20 अक्टूबर 1999 को बिहार विधानसभा ने ‘डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम’ पास किया. अंधविश्वास के खिलाफ देश का यह दूसरा बड़ा कानून था. आज यह कानून 6 राज्यों में लागू है और वे इसे 9 अन्य राज्यों में लागू कराने के लिए अंतिम समय तक संघर्षरत रहे.

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अंतिम इच्छा: जाते-जाते भी समाज को दे गए अपनी देह

प्रेमचंद जितने महान जीवन में थे, उतने ही प्रेरणादायक अपनी मृत्यु में भी रहे. संघर्ष की दास्तां सुनाते-सुनाते वे चुप तो हो गए, लेकिन अपनी अंतिम इच्छा में अपनी देह को एमजीएम अस्पताल को दान करने का निर्देश दे गए. एक ऐसा व्यक्ति जिसने दूसरों के घर बचाने के लिए खुद को झोंक दिया, उसकी कमी हमेशा खलेगी. प्रेमचंद चले गए, लेकिन उनके द्वारा जलाई गई चेतना की मशाल उन हजारों महिलाओं के घरों में रोशनी देती रहेगी, जिन्हें उन्होंने ‘डायन’ के नरक से निकाला था.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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