Jamshedpur News : आजादी के 78 साल बाद भी स्कूल में शौचालय नहीं, निर्माण शुरू हुआ तो पार्षद और स्थानीय लोगों ने रुकवाया काम

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Jamshedpur News : आजादी के 78 साल बाद भी स्कूल में शौचालय नहीं, निर्माण शुरू हुआ तो पार्षद और स्थानीय लोगों ने रुकवाया काम

जमशेदपुर के स्कूल में शौचालय निर्माण का स्थानीय लोगों और पार्षद ने विरोध किया। शिक्षिकाओं ने अपनी बदहाली और स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर सिस्टम पर उठाए सवाल।

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जमशेदपुर: 1वीं सदी के चमकीले और चांद पर पहुंचने का दम भरने वाले भारत के समानांतर, एक और भारत भी सांस ले रहा है. बुनियादी अधिकारों से महरूम भारत. इसकी एक स्याह तस्वीर जमशेदपुर के मानगो वर्कर्स कॉलेज गेट के पास स्थित मछुआपाड़ा उत्क्रमित मध्य विद्यालय में दिखती है. यह स्कूल आज व्यवस्था की उपेक्षा, समाज और सबसे बढ़कर संवेदनहीन ''नेतागिरी'' के आगे अपनी बदहाली का रोना रो रहा है. आजादी के 78 साल बीत चुके हैं, लेकिन नर्सरी से पांचवीं तक की पढ़ाई कराने वाली इस स्कूल के भाग्य में आज तक एक स्थायी शौचालय की लकीर नहीं खींच सकी. जब केंद्र सरकार राज्यों से रिपोर्ट मांगती है कि किन स्कूलों में शौचालय नहीं है, तो पूर्वी सिंहभूम जिले का यह स्कूल बार-बार व्यवस्था के गाल पर तमाचे की तरह सामने आता है, जिससे पूरे जिले और राज्य की छवि धूमिल होती रही है.तस्वीर बदलने के लिए झारखंड शिक्षा परियोजना ने हाल ही में करीब 2.5 लाख रुपये आवंटित किये. स्कूल के बगल में सरकारी जमीन पर दो दिनों पहले ही दो शौचालयों (एक छात्र और एक छात्रा के लिए) का निर्माण कार्य शुरू हुआ. लगा कि दशकों का कलंक अब मिट जायेगा, लेकिन शुक्रवार को जो हुआ, उसने समाज की संवेदनशीलता पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिये.

जब समाज और राजनीति बन गये ''बाधक''

शुक्रवार को जैसे ही ठेकेदार के मजदूरों ने शौचालय निर्माण के लिए जुड़ाई का काम शुरू किया, कुछ स्थानीय लोग वहां धमक पड़े. मजदूरों को डरा-धमका कर भगा दिया. विरोध की दलील हैरान करने वाली थी. कहा गया कि यहां शौचालय बना तो गंध आयेगी. हैरत की बात तो यह है कि जब ठेकेदार ने बच्चों और शिक्षकों के हित का हवाला देते हुए स्थानीय पार्षद से मदद की गुहार लगायी, तो जनप्रतिनिधि ने सहयोग करने के बजाय काम को ही रोक देने का फरमान सुना दिया. नतीजा, यह हुआ कि भारी दबाव और मशक्कत के बाद शुरू हुआ काम एक बार फिर ''नेतागिरी'' और संकीर्ण सोच की भेंट चढ़ गया.

शिक्षिका का दर्द : सुबह 9 से दोपहर 3 बजे तक हम हर दिन तिल-तिल मरते हैं

इस पूरे गतिरोध के बीच सबसे दर्दनाक पहलू उस मानवीय पीड़ा का है, जिससे यहां की शिक्षिकाएं हर दिन गुजरती हैं. मामले की गंभीरता को देखते हुए कनीय अभियंता श्वेता कुमारी ने जब स्कूल का मुआयना किया, तो उनके सामने जो हकीकत आयी, वह किसी का भी दिल दहलाने के लिए काफी है. फिलहाल इस स्कूल में 35 बच्चे पढ़ते हैं, जिन्हें पढ़ाने की जिम्मेदारी दो महिला शिक्षिकाओं के कंधों पर है. स्कूल की एक महिला शिक्षिका ने रुंधे गले से कनीय अभियंता को अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि सुबह 9 बजे स्कूल की घंटी बजती है और दोपहर 3 बजे छुट्टी होती है. इन 6 घंटों के दौरान अगर हमें बाथरूम जाना हो, तो हमारे पास कोई विकल्प नहीं होता. हमें अपने पेशाब को जबरन रोक कर रखना पड़ता है. रोज पेट में असहनीय दर्द होता है. हमें समझ नहीं आता कि हम बच्चों को पढ़ाएं या इस शारीरिक प्रताड़ना को झेलें. अगर यह स्थिति कुछ दिन और रही, तो हम गंभीर रूप से बीमार हो जायेंगे. यह सिर्फ एक शिक्षिका की शिकायत नहीं है, बल्कि देश के उस सिस्टम को भी ठेंगा दिखाती है, जो महिला सशक्तिकरण और ''बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ'' का दम भरता है. जहां महिला शिक्षक और नन्हीं बच्चियां हर दिन एक बुनियादी जैविक जरूरत के लिए तड़पने को मजबूर हैं.

वर्षों संघर्ष के बाद मिला था फैब्रिकेटेड शौचालय

मछुआपाड़ा मध्य विद्यालय में शौचालय की यह पहली लड़ाई नहीं है. इससे पहले भी जब ऊपर से भारी दबाव आया, तो झारखंड शिक्षा परियोजना ने आनन-फानन में एक अस्थायी ''''फैब्रिकेटेड'''' शौचालय भिजवा कर पल्ला झाड़ लिया था. लेकिन सही रख-रखाव और घटिया गुणवत्ता के कारण वह भी जल्द ही टूट गया. मामले की जांच करने पहुंचीं कनीय अभियंता श्वेता कुमारी ने भी स्पष्ट किया कि स्कूल के लिए यह शौचालय अत्यंत आवश्यक है और इसके बिना स्कूल का संचालन अमानवीय है.


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राजेश कुमार

लेखक के बारे में

By राजेश कुमार

राजेश कुमार सिंह, 19 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य कर रहे है. कटिहार जिला के मनिहारी अनुमंडल से प्रिंट के साथ डिजिटल में तीन वर्षों से कार्य कर रहे हैं. राजनीति, समाजिक क्षेत्र में गहरी रूचि रखते हैं.

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