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नौवीं क्लास में डप्रिेशन का शिकार हो साधु बनने चला गया

8 Apr, 2016 12:00 am
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नौवीं क्लास में डप्रिेशन का शिकार हो साधु बनने चला गया

नाैवीं क्लास में डिप्रेशन का शिकार हो साधु बनने चला गयादोबारा पढ़ायी शुरू की और प्रथम श्रेणी में पास हुआफोटो है डॉ पुरुषोत्तम कुमार वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी और सदस्य सचिव नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति जमशेदपुर मैंने वर्ष 1980 में उच्च विद्यालय धरहरा (मुंगेर) बिहार से प्रथम श्रेणी से मैट्रिक पास किया. मैं क्लास आठ तक […]

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नाैवीं क्लास में डिप्रेशन का शिकार हो साधु बनने चला गयादोबारा पढ़ायी शुरू की और प्रथम श्रेणी में पास हुआफोटो है डॉ पुरुषोत्तम कुमार वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी और सदस्य सचिव नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति जमशेदपुर मैंने वर्ष 1980 में उच्च विद्यालय धरहरा (मुंगेर) बिहार से प्रथम श्रेणी से मैट्रिक पास किया. मैं क्लास आठ तक टॉप स्टूडेंट रहा. मुझे क्लास नौ में शिक्षकों की प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा. क्लास में जो कभी पास नहीं होता था उससे मेरी तुलना होने लगी. दरअसल जहां मैं पढ़ता था उस स्कूल में मेरे पिता क्लर्क हुआ करते थे. उन्होंने नौकरी रहते एमए किया और विद्यालय के शिक्षक बन गये. इस वजह से कुछ शिक्षक उनसे ईर्ष्या करने लगे. इसका शिकार मुझे होना पड़ा. फेल और पीछे बैठने वाले छात्रों से मेरी तुलना होने लगी. यहां तक मेरे पिता को भी लगने लगा कि मैं पढ़ नहीं रहा हूं. वह भी पिटाई करने लगे. घर छोड़कर भाग गया मैं अवसाद में रहने लगा. तंबाकू जैसे नशा का सेवन करने लगा. मैं पूरी तरह से डिप्रेशन में चला गया. लगने लगा कि अब मुझसे पढ़ायी नहीं होगी. स्थिति यहां तक आ गयी कि मैं घर छोड़कर भाग गया. बनारस में कुछ दिनों तक साधु के साथ रहा. उनके साथ भिक्षा भी मांगी. लेकिन उसी साधु ने मुझे घर जाने के लिए प्रेरित किया. मुझे मां की परेशानी और पिता की चिंता भी सता रही थी. बनारस से लौटने के बाद पिता ने मेरी पीड़ा को समझा. उनका सकारात्मक सहयोग मिला. मैंने दोबारा पढ़ायी शुरू की. मुझे क्लास आठ तक दिक्कत थी नहीं. मेहनत की और मैट्रिक प्रथम श्रेणी से पास किया. इंटर का रिजल्ट गड़बड़ाया मैंने इंटर में बायोलॉजी की पढ़ायी की. जगजीवन राम श्रमिक महाविद्यालय जमालपुर से इंटर पास किया. इसमें मेरा रिजल्ट अच्छा नहीं रहा. इसकी वजह शायद बाहर रहने के कारण आजादी रही. कर्तव्य बोध का अभाव रहा. पढ़ायी ढंग से हो नहीं पायी. इंटर के बाद मैंने अपना ट्रैक बदला. मैंने स्नातक में हिंदी ऑनर्स लिया. निर्धारित किया लक्ष्य स्नातक में स्थिति बदली. मैंने अब तय किया कि बहुत हो गया, अब पढ़ना चाहिए. मैंने अपना लक्ष्य निर्धारित किया कि ध्यान (मेडिटेशन) करूंगा. पढ़ने का रूटीन बनाऊंगा और उसका निष्ठा के साथ पालन भी करूंगा. यही वजह रही कि स्नातकोत्तर में मेरा एडमिशन पटना विश्वविद्यालय में हो गया. पटना कॉलेज पटना में मुझे डॉ चंद्र किशोर पांडेय, निशांत केतु, डॉ राम खेलावन राय, डॉ गोपाल राय, आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा, प्रो चंद किशोर नवल, प्रो भृगुनंदन त्रिपाठी जैसे नामचीन विद्वानों से पढ़ने का मौका मिला. सभी मेरे गुुरु और मित्र दोनों रहे. स्वाभाविक तौर पर हिंदी के प्रति मेरी रुचि और समझ बढ़ी. मैं पटना विश्वविद्यालय का टॉपर रहा. पहली नौकरी पुना विवि में लेक्चरर के रूप में हुई. इसके बाद मेरी नियुक्ति नेशनल मेटालर्जिकल लेबोरेट्री में हुई.

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