266 की यूरिया खेत तक पहुंचते-पहुंचते 375 रुपये, सप्लाई चेन में बढ़ता दाम किसानों पर पड़ रहा भारी

Author Jaynarayan|Edited by Janardan Pandey
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हजारीबाग में यूरिया की सरकारी कीमत 266 रुपये है, लेकिन किसानों को यह 375 रुपये में मिल रही है। सप्लाई चेन में हो रही धांधली से किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ा है।

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जयनारायण हजारीबाग. खरीफ सीजन में किसानों के लिए सबसे जरूरी उर्वरक यूरिया का सरकारी अनुदानित मूल्य 266.50 रुपये प्रति बैग निर्धारित है, लेकिन हकीकत यह है कि खेत तक पहुंचते-पहुंचते यही बोरी 350 से 375 रुपये तक में किसानों को मिल रही है. यानी एक बोरी पर 70 से 100 रुपये तक का अतिरिक्त बोझ किसानों पर पड़ रहा है. हजारीबाग जिले में विभाग के अनुसार खाद की कोई कमी नहीं है. जिले में यूरिया 10 596.64 मैट्रिक टन किसानों के लिए उपलब्ध है. डीएपी 1073.15, मैट्रिक टन, एमओपी 513.075 मैट्रिक टन, एनपीकेएस 34 69.6 मैट्रिक टन, एसएसपी 262.85 मैट्रिक टन, एफओएम 11.2 मैट्रिक टन उपलब्ध है. सवाल यह है कि सरकार की ओर से तय कीमत वाला यूरिया आखिर किस कड़ी में महंगा हो जाता है और इस बढ़ी हुई कीमत का लाभ किसे मिलता है? यह पूरा तंत्र जांच का विषय है. सप्लाई चयन के हर स्तर पर खाद का लागत दाम बढ़ता है- हजारीबाग जिले में यूरिया की आपूर्ति रेलवे रैक के माध्यम से होता है. रैक प्वाइंट पर पहुंचने के बाद खाद गोदामों में जाती है. वहां से थोक विक्रेताओं और फिर खुदरा दुकानदारों के माध्यम से किसानों तक पहुंचती है. इस पूरी सप्लाई चेन में हर स्तर पर लागत और अन्य मदों के नाम पर कीमत बढ़ती जाती है. नतीजा यह होता है कि सरकारी दर पर मिलने वाली यूरिया किसानों तक निर्धारित मूल्य पर नहीं पहुंच पाती. जिला कृषि पदाधिकारी डॉ रायमनी हेंब्रम ने कहा कि कोई भी खाद के थोक विक्रेता किसी भी रिटेल दुकानदार या किसान को अन्य प्रोडक्ट को टैग कर नहीं बचेंगे. यदि इसकी शिकायत मिलती है तो कार्रवाई की जायेगी. इफिको के जोनल मैनेजर चन्दन ने बताया की मिट्टी में 16 तत्व रहते हैं. सभी तत्वों का पोषण जरूरी है. झारखंड के किसान अपने खेतों में सिर्फ यूरिया का उपयोग करते हैं. यूरिया का काम पौधों को ग्रोथ बढ़ाना और हरा करना है. पौधे के लिए कंप्लीट न्यूट्रीशन के लिए किसानों को यूरिया के साथ अन्य प्रोडक्ट को टैग किया जाता है.

उर्वरक कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि यूरिया के वितरण और बिक्री में वर्षों से एक ऐसा नेटवर्क काम कर रहा है, जो बाजार में कीमतों पर प्रभाव डालता है. किसानों के बीच यह कहावत भी प्रचलित है कि यूरिया की बोरी जितनी बार जमीन पर पटकती है, उसकी कीमत उतनी ही बढ़ती जाती है. यह कहावत इस बात की ओर इशारा करती है कि परिवहन, भंडारण और वितरण की हर कड़ी में कीमत बढ़ने का दावा किया जाता है, जबकि इसका वास्तविक लाभ किसानों को नहीं मिलता. एक बड़ा कारण कंपनियों की टैगिंग व्यवस्था भी बताई जाती है. खाद विक्रेताओं के अनुसार कई कंपनियां यूरिया के साथ नैनो यूरिया, नैनो डीएपी, कैल्शियम या अन्य उत्पाद भी भेजती हैं. किसान अक्सर इन अतिरिक्त उत्पादों को खरीदना नहीं चाहते, लेकिन कई जगह इनकी लागत यूरिया के साथ जोड़कर वसूली जाती है. इससे यूरिया का वास्तविक मूल्य और बढ़ जाता है तथा किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है. किसानों दारू के किसान अशोक कुमार ने बताया कि खेती की लागत पहले ही डीजल, बीज और मजदूरी की वजह से बढ़ चुकी है. ऐसे में यदि सरकार द्वारा अनुदानित मूल्य पर उपलब्ध कराई जाने वाली यूरिया भी तय दर पर नहीं मिले, तो इसका सीधा असर खेती की लागत और किसानों की आय पर पड़ता है. अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन पूरे वितरण तंत्र की निगरानी करे. निगरानी की टीम बनी पर जांच नहीं- हजारीबाग जिले में खाद की आपूर्ति व विभिन्न चैनल को निगरानी के लिए पांच सदस्यीय टीम बनाया गया है. इस टीम में जिला कृषि पदाधिकारी रायमणि हेंब्रम, अनुमंडल कृषि पदाधिकारी अनुप कुमार हेंब्रम, कनीय पौधा संरक्षण पदाधिकारी अलका कुमारी, सहायक कृषि पदाधिकारी वनस्पित समीर कुमार राय शामिल हैं. इस टीम ने अप्रैल से जुलाई तक एक भी जांच नहीं किया है.


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लेखक के बारे में

By जयनारायण

जयनारायण प्रभात खबर से पिछले 22 वर्षों से जुड़े हुए हैं. इन्होंने जन सरोकार और खोजी पत्रकारिता से अपनी पहचान बनायी है. एक्सक्लूसिव खबरों के माध्यम से समाज के मुद्दों को मजबूती से सामने लाने का प्रयास करते हैं. वर्तमान में प्रभात खबर के हजारीबाग ब्यूरो चीफ हैं.

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