हजारीबाग जमीन विवाद: SDO के फैसले पर हाईकोर्ट का ब्रेक, 118 रैयतों को बड़ी राहत

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने हजारीबाग बरकठा के बेरो कला में 118 रैयतों की जमाबंदी रद्द करने के बरही SDO के आदेश पर रोक लगा दी है. पढ़ें क्या है पूरा मामला.
रांची से सतीश सिंह की रिपोर्ट
Jharkhand High Court, रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग जिले के बरकठा अंचल अंतर्गत मौजा-बेरो कला की 117.68 एकड़ की विशाल विवादित जमीन के मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने पीड़ित रैयतों के पक्ष में फैसला लेते हुए विवादित जमीन पर फिलहाल ‘यथास्थिति’ (Status Quo) बनाए रखने का निर्देश दिया है. इसके साथ ही कोर्ट ने बरही के एसडीओ (SDO) द्वारा 118 रैयतों की जमाबंदी को अचानक रद्द करने के फैसले पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है. न्यायमूर्ति आनंद सेन की एकलपीठ ने लक्ष्मण कुमार दास व अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश पारित किया. अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों (Opposite Parties) को कड़ा नोटिस जारी करते हुए छह सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है.
40 साल पुरानी जमाबंदी को SDO ने एक झटके में बदल दिया था
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा, रवि कुमार, राहुल कमलेश और अंशुमन मिश्रा ने मजबूत दलीलें पेश कीं. उन्होंने कोर्ट को बताया मौजा-बेरो कला (थाना नंबर 45, खाता नंबर 01) की इस 117.68 एकड़ जमीन पर पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से 118 रैयतों के नाम से वैध जमाबंदी चली आ रही थी और वे वहां काबिज थे. लेकिन बरही के एसडीओ ने 27 अगस्त 2024 को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर एक विवादित आदेश पारित किया और सभी 118 गरीब रैयतों की पुरानी जमाबंदी को अचानक रद्द कर दिया. इतना ही नहीं, नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए एसडीओ ने उक्त जमीन की एक नई जमाबंदी आनन-फानन में एक रसूखदार ‘निजी प्रतिवादी’ (Private Respondent) के नाम पर दर्ज कर दी, जो पूरी तरह से गैर-कानूनी है.
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1984 में प्रमंडलीय आयुक्त ने जिस दावे को खारिज किया, उसे SDO ने मान लिया
हाईकोर्ट को अवगत कराया गया कि इस बेशकीमती जमीन को लेकर आज से चार दशक पहले भी बड़ा विवाद हुआ था. उस समय 24 जुलाई 1984 को उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल के तत्कालीन आयुक्त (Commissioner) ने गहन जांच के बाद उस ‘निजी प्रतिवादी’ के दावे को सिरे से खारिज कर दिया था और 118 रैयतों के मालिकाना हक और जमाबंदी के पक्ष में ही अंतिम आदेश सुनाया था. अधिवक्ताओं ने कोर्ट में सवाल उठाया कि 40 साल पुराने प्रमंडलीय आयुक्त के ऐतिहासिक आदेश और दशकों से चले आ रहे रैयतों के कब्जे को दरकिनार करने का अधिकार एक अनुमंडल पदाधिकारी (SDO) को कैसे मिल गया? एसडीओ द्वारा नियम विरुद्ध तरीके से जमाबंदी रद्द किए जाने और बेघर होने की नौबत आने के बाद ही रैयतों ने हाईकोर्ट की शरण ली थी, जहां उन्हें अब बड़ी राहत मिली है.
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कोडरमा के रैयती जमीन पर हाईकोर्ट ने अपनाया है सख्त रूख
झारखंड हाईकोर्ट ने कोडरमा जिले के मरकच्चो अंचल के मौजा-पूर्णानगर की करीब नौ एकड़ रैयती जमीन से जुड़े विवाद पर सख्त रुख अपनाया है. अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार को जमीन से जुड़े पुराने रिकॉर्ड (पैरेंट रजिस्टर) अदालत के समक्ष पेश करने का आदेश दिया है. जस्टिस आनंद सेन की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता नरेश भारती एवं त्रिलोकी भारती द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया है. अदालत ने सरकार को पूर्ववर्ती जिला-हजारीबाग (वर्तमान कोडरमा) के मरकच्चो अंचल, हल्का-VII, ग्राम-पूर्णानगर, होल्डिंग नं. 104 का मूल पैरेंट रजिस्टर दाखिल करने को कहा है. इस मामले की अगली सुनवाई अब 23 जुलाई को तय की गयी है. याचिकाकर्ताओं की ओर से बहस करते हुए अधिवक्ता रवि कुमार व अंशुमन मिश्रा बताया कि मौजा-पूर्णानगर (खाता संख्या-104, होल्डिंग-104) की लगभग नौ एकड़ रैयती जमीन पर याचिकाकर्ताओं और उनके दिवंगत पिता स्वर्गीय प्रयाग भारती का वर्षों से विधिवत दखल-कब्जा चला आ रहा है. रजिस्टर-II के पेज-132, सीरियल-14 के अनुसार, इस जमीन पर वर्ष 1994 तक नियमित रूप से मालगुजारी रसीद निर्गत की गयी थी. लेकिन वर्ष 1994 के बाद जमीन के ऑनलाइन रिकॉर्ड में बकाया दिखने के कारण अंचल कार्यालय द्वारा रसीद काटना बंद कर दिया गया. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने बकाया मालगुजारी जमा कर नयी रसीद निर्गत कराने के लिए मरकच्चो अंचल कार्यालय में कई बार लिखित आवेदन दिये. इसके बावजूद अंचल प्रशासन द्वारा इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी. रैयतों को न्याय के लिए हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी है.
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By Sameer Oraon
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