युद्ध में शामिल रिटायर्ड सैनिकों की जुबानी, करगिल युद्ध की कहानी

Updated at : 25 Jul 2025 10:56 PM (IST)
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युद्ध में शामिल रिटायर्ड सैनिकों की जुबानी, करगिल युद्ध की कहानी

युद्ध में शामिल रिटायर्ड सैनिकों की जुबानी, करगिल युद्ध की कहानी

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सिसई. करगिल युद्ध में सिसई प्रखंड के तीन सैनिकों में अपनी वीरता का परिचय दिया है. इसमें लांस नायक बिरसा उरांव युद्ध के दौरान शहीद हो गये थे. जबकि मंगल उरांव व करमचंद लोहरा ने युद्ध में पाकिस्तानी सैनिकों को काफी क्षति पहुंचाये थे. मंगल उरांव व करमचंद लोहरा अभी सिसई प्रखंड में अपने परिवार के साथ रहते हैं और खेतीबारी कर रहे हैं. दोनों रिटायर्ड सैनिकों ने करगिल युद्ध की कहानी बतायी. साथ ही किस प्रकार युद्ध में दुश्मनों को मारा था. उन यादों को प्रभात खबर से साझा किया.

मैंने पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ा था : मंगल उरांव

वर्ष 1987 में भारतीय थल सेना में योगदान देने वाले सूबेदार मंगल उरांव करगिल युद्ध के दौरान करगिल के मधान व जुबर हिल पोस्ट से पाकिस्तानी सेनाओं को खदेड़ कर खाली कराया था. उन्होंने कहा कि 1989 में प्रथम बिहार रेजिमेंट में शामिल हुए. 1999 में करगिल युद्ध के दौरान उनके नौ साथी शहीद हुए और 32 जवान घायल हुए थे. 22 मई 1999 को मंगल उरांव करगिल के अपने फायर बेस में पहुंचे थे. सात जुलाई 1999 को पाकिस्तानी फौज को खदेड़ कर भारतीय पोस्ट को खाली कराने में सफलता पायी थी. इस दौरान कई मर्तबा पाकिस्तानी सैनिकों ने इन पर हमला किया था. मूलतः घाघरा प्रखंड के गम्हरिया गांव निवासी सूबेदार मंगल उरांव 2015 में सेवानिवृत्त होकर दो बेटी, एक बेटा व पत्नी के साथ पिछले 11 वर्षों से सिसई प्रखंड में रह रहे हैं. मंगल उरांव ने बताया कि युद्ध के समय खाने-पीने की बहुत पेरशानी होती थी. दो दिनों तक पानी पीकर युद्ध करना पड़ा था. परिजन परेशान न हो, इसलिए परिजनों को युद्ध की जानकारी नहीं दी थी.

कई पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया था : करमचंद

सिसई प्रखंड के अंबाबारी निवासी लांस नायक करमचंद लोहरा 1999 में हुए करगिल युद्ध में शामिल हुए थे. वे युद्ध के दौरान अपने बटालियन के साथ मिल कर भारतीय सीमा में घुस आये पाकिस्तानी फौज के कई जवानों को मार गिराया था और कुछ को खदेड़ कर द्रास व थारू पोस्ट को खाली कराया था. श्री लोहरा बताते हैं कि तीन अगस्त 1998 में वे भारतीय सेना में भर्ती हुए थे. 1999 में वे बिहार रेजिमेंट दानापुर में ट्रेनिंग कर रहे थे. उसी दौरान कारगिल युद्ध शुरू हो गया था. उन्हें भी बटालियन के साथ कारगिल के द्रास सेक्टर भेजा गया. वहां बोफोर्स, आर्टलरी, लड़ाकू विमान कि गर्जना, गोलों की आवाज और छोटे हथियारों को तड़तड़ाहट से वे और उनके कई साथी शुरुआत में डर गये थे, पर वतन की हिफाजत का जज्बा उन्हें विचलित नहीं किया और हथियार उठाकर द्रास व थारू पोस्ट पर कब्जा जमाये पाकिस्तानी सेनाओं को मारने और खदेड़ने में सफल रहे. श्री लोहरा अब सेवानिवृत्त होकर अपने परिवार के साथ गृहस्थ जीवन जी रहे हैं.

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