हथियार की जगह 300 बच्चों ने थाम ली कलम

Published at :15 Apr 2017 7:27 AM (IST)
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हथियार की जगह 300 बच्चों ने थाम ली कलम

दुर्जय पासवान गुमला : बिशुनपुर प्रखंड के घोर नक्सल प्रभावित गांव के 300 बच्चे हथियार उठाने से पहले कलम थाम लिया. अब बच्चों के चेहरे पर मुस्कान है. उन्हें न हथियार उठाने का डर है और न ही उन पर नक्सलियों का सामान ढोने का दबाव है. बस पढ़ लिख कर अच्छा इनसान बनना है. […]

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दुर्जय पासवान
गुमला : बिशुनपुर प्रखंड के घोर नक्सल प्रभावित गांव के 300 बच्चे हथियार उठाने से पहले कलम थाम लिया. अब बच्चों के चेहरे पर मुस्कान है. उन्हें न हथियार उठाने का डर है और न ही उन पर नक्सलियों का सामान ढोने का दबाव है. बस पढ़ लिख कर अच्छा इनसान बनना है. यह सब गुमला प्रशासन की पहल से हुआ है. पांच साल पहले माता-पिता भयभीत रहते थे कि कब नक्सली आयेंगे और उनके बच्चों को उठा कर ले जायेंगे. लेकिन नकुल व मदन के सरेंडर करने के बाद अब माता-पिता के चेहरे से डर गायब है.
ज्ञात हो कि बाल दस्ता बनाने के लिए बच्चों को उठा कर ले जाने का खेल नक्सली पांच साल से खेल रहे थे. लेकिन वर्ष 2015 के अप्रैल माह में जब मामला प्रकाश में आया, तो सरकार हरकत में आयी. जब माता-पिता ने प्रशासन के समक्ष बच्चों को नक्सलियों द्वारा उठा कर ले जाने की बात रखी. शुरू में बिशुनपुर व पेशरार क्षेत्र से करीब 38 बच्चों को नक्सलियों द्वारा उठा कर ले जाने की बात सामने आयी. मामला गंभीर था. जब अखबार के माध्यम से मामला सामने आया, तो हाइकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया. इसके बाद पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर बच्चों को मुक्त कराना शुरू किया. पुलिस द्वारा अभी तक पांच से छह बच्चे मुक्त कराये गये हैं, जबकि 15-16 बच्चे खुद नक्सलियों के चंगुल से भाग कर वापस आ गये.
बच्चे मांगने की दो बड़ी घटनाएं 29 मई 2016
पुलिस ने माओवादी के खिलाफ रूद्र ऑपरेशन चलाया. बिशुनपुर के कुमाड़ी से नक्सलियों के दस्ते से दो बच्चों को मुक्त कराया. ऑपरेशन 29 मई से दो जून तक चला था.
16 सितंबर 2016
माओवादियों ने बिशुनपुर के कठठोकवा के वार्ड पार्षद करमा उरांव की हत्या कर दी थी. नक्सली दस्ता के लिए बच्चा मांगा था. करमा ने देने से इनकार किया, तो उसे पीट-पीट कर मार डाला. शव को भी गुमला लाने नहीं दिया.
यहं के बच्चे दहशत में थे
बिशुनपुर प्रखंड क्षेत्र के जमटी, कटिया, कुमाड़ी, गोबरसेला, बोरहा, रेहलदाग, बनालात, घाघरा, जोरी व आसपास के 20 गांव के बच्चे नक्सलियों के कारण दहशत में थे. हर समय बच्चों के मन में डर बना रहता था कि कहीं नक्सली आकर उन्हें उठा कर न ले जायें.
नक्सलियों के डर से ही बच्चों ने स्कूल भी जाना छोड़ दिया था. यहां तक कि शिक्षक भी बहुत कम स्कूल जाते थे, क्योंकि शिक्षकों का प्रोफाइल नक्सलियों ने बनाना शुरू कर दिया था. यहां तक कि स्कूलों से भी नक्सली बच्चे मांग चुके थे, लेकिन अब इन क्षेत्रों की तसवीर बदल रही है. उम्मीद है कि आने वाला दिन इस क्षेत्र के लिए बेहतर होगा.
नक्सलियों द्वारा बच्चे मांगने व पुलिस की पहल
28 फरवरी 2016 को नकुल यादव ने जमटी गांव में बैठक कर एक-एक बच्चे मांगे थे. बच्चे नहीं देने पर नकुल ने जमटी गांव को नजरबंद कर दिया था. गांव में नक्सली कैंप करने लगे थे.
इसके बाद चार मार्च 2016 को गुमला के पूर्व एसपी भीमसेन टुटी जमटी गांव घुसे. तीन दिन तक नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाया था. पुन: 21 मार्च 2016 को डीआइजी, एसपी, एएसपी व सीआरपीएफ के सीओ जमटी गांव में घुसे और 24 बच्चों को सुरक्षित निकाला था. 22 मार्च 2016 को डीसी श्रवण साय व एसपी बिशुनपुर पहुंचे और बच्चों से मिल कर पढ़ने का जज्बा भरा. 26 मार्च 2016 को डीजीपी डीके पांडेय बिशुनपुर पहुंचे. यहां वे नक्सलियों के गढ़ से निकाले गये 24 बच्चों से मिल कर पुलिस बनने की शिक्षा दी.
21 मार्च को पहला प्रयास हुआ
21 मार्च 2106 को पुलिस प्रशासन द्वारा बच्चों के संरक्षण के लिए पहला प्रयास हुआ था. तत्कालीन डीआइजी आरके धान, तत्कालीन एसपी भीमसेन टुटी, तत्कालीन एएसपी पवन कुमार सिंह व सीआरपीएफ के तत्कालीन सीओ भीपी सिंह पुलिस बल के साथ जमटी गांव पहुंच कर गांव से 24 बच्चों को सुरक्षित नक्सलियों के गढ़ से निकाला था. पुलिस ने सभी बच्चों का स्कूलों में दाखिला कराया. इसके बाद गांव के अन्य लोग भी बच्चों को स्वयं प्रशासन को सौंपा था. ग्रामीणों ने नक्सलियों के डर से करीब 300 बच्चों को प्रशासन को सौंप चुके हैं. ये बच्चे अभी घाघरा व बिशुनपुर के विभिन्न स्कूलों में पढ़ रहे हैं.
हाइकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया था
नक्सली नकुल व मदन कई बच्चों को उठा कर ले गये थे. इन दोनों ने नक्सली बाल दस्ता तैयार किया है. अब नकुल व मदन सरेंडर कर चुके हैं, लेकिन अभी भी रवींद्र गंझू के दस्ते में कई बच्चे हैं.
दूसरे नक्सली दस्तों में भी कई बच्चे हैं. नकुल द्वारा बच्चों को जबरन उठा कर ले जाने संबंधी समाचार को प्रभात खबर ने सबसे पहले प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया था. इसके बाद 22 अप्रैल 2015 को हाइकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया. तीन मई 2015 को सरकार ने हाइकोर्ट में कहा था कि बच्चे गायब मामले में प्राथमिकी दर्ज की गयी है. बच्चों को बरामद किया जा रहा है. इसके बाद धीरे-धीरे बच्चे बरामद होने लगे. कुछ बच्चे खुद भाग कर आ गये, तो कुछ को पुलिस ने सकुशल बरामद किया.
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