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गुमला : आजाद भारत में गुमनाम जी रहे डहूपानी के ग्रामीण, तारणहार का है इंतजार

Updated at : 28 Nov 2019 11:43 AM (IST)
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गुमला : आजाद भारत में गुमनाम जी रहे डहूपानी के ग्रामीण, तारणहार का है इंतजार

जगरनाथगुमला : गुमला जिले के पालकोट प्रखंड में डहूपानी पंचायत है. बीहड़ जंगल व पहाड़ी इलाके में यह पंचायत बसी है. यहां के ग्रामीण अपने को वनराज कहते हैं. कारण, यह पूरा इलाका जंगली है, इसलिए ग्रामीण खुद को जंगल का राजा भी कहते हैं. लेकिन इस क्षेत्र के करीब पांच हजार ग्रामीण आज भी […]

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जगरनाथ
गुमला :
गुमला जिले के पालकोट प्रखंड में डहूपानी पंचायत है. बीहड़ जंगल व पहाड़ी इलाके में यह पंचायत बसी है. यहां के ग्रामीण अपने को वनराज कहते हैं. कारण, यह पूरा इलाका जंगली है, इसलिए ग्रामीण खुद को जंगल का राजा भी कहते हैं. लेकिन इस क्षेत्र के करीब पांच हजार ग्रामीण आज भी उम्मीदों में जी रहे हैं. पूरी पंचायत को किसी तारणहार का इंतजार है, ताकि पंचायत की तकदीर व तसवीर बदल सके.

आजाद भारत में पालकोट प्रखंड का यह पहला गांव होगा, जहां के लोग आज भी चुआं व नदी का पानी पीते हैं. इतने बीहड़ जंगल व पहाड़ों के बीच यह पंचायत कैसे बसी? यह अपने आप में इतिहास है. जैसा ग्रामीण बताते हैं : कुछ लोग अंग्रेज, तो कुछ लोग जमींदारों से डर कर इस क्षेत्र में पहुंचते गये. इसके बाद एक-एक कर लोग झोपड़ीनुमा घर बना कर रहते गये. जंगली इलाका था. खाने के लिए आसानी से जंगल का उत्पाद मिल जाता था, इसलिए लोग यहीं रह गये. धीरे-धीरे आबादी बढ़ी. आज इस पंचायत में करीब पांच हजार लोग निवास करते हैं, लेकिन आज की पीढ़ी इस बात से परेशान है कि हमारे पूर्वज इतने बीहड़ जंगल में क्यों आकर बसे. क्योंकि यहां न तो शिक्षा का स्तर ठीक है न ही कोई रोजगार है. कुछ युवक-युवती गांव के स्कूलों में पढ़ने के बाद शहर आ गये, जहां वे किराये के मकान व हॉस्टल में रह कर कॉलेज में पढ़ रहे हैं. यहां कहीं-कहीं कच्ची सड़क है. कई जगह तो रास्ता नहीं है.

पहाड़ पर चढ़ कर गांव जाना पड़ता है. कुछ स्थानों पर पगडंडी है. कुल मिला कर कहें तो डहूपानी व आसपास के गांवों में जाना मुश्किल भरा सफर है. गांव पहुंचने पर वहां के लोगों से बात की. लोगों ने पहले तो नेताओं व प्रशासनिक अधिकारियों को कोसा, क्योंकि विधायक व सांसद को आज तक पंचायत के लोग अपने गांव में नहीं देखा है. हां, इन विधायक व सांसद के कुछ एजेंट जरूर गांव में आते हैं. प्रशासन इस क्षेत्र में नक्सलियों के आवागमन से सतर्क रहता है. इस कारण प्रशासन डहूपानी नहीं जाता है, फिर भी लोगों को इस क्षेत्र के विकास के लिए किसी तारणहार का इंतजार है.

पंचायत की मुख्य समस्या

सड़क नहीं है. पहाड़, पगडंडी, जंगली रास्ते से होकर गांव जाते हैं लोग.

सरकार ने शौचालय नहीं बनवाया है. खुले में शौच लोग जाते हैं.

पानी की व्यवस्था नहीं है. पूर्वजों के समय से चुआं का पानी पी रहे हैं.

पक्का आवास किसी का नहीं बना है. आज भी कच्चे घर में रहते हैं.

पूरी पंचायत में रोजगार का साधन नहीं है. गांव से पलायन हो रहा है.

शिक्षा का स्तर खराब है. स्कूल से बच्चों की संख्या कम हो रही है.

लोगों को वृद्धावस्था व विधवा पेंशन नहीं मिल रही.

मैं स्नातक का छात्र हूं. शहर में हॉस्टल में रह कर पढ़ता है. बचपन इसी बीहड़ जंगल के बीच गुजरा. लेकिन दुख होता है कि आज तक हमारे गांव तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं बनी है. बड़ी मुश्किल से सफर करना पड़ता है.
शिवानंदन कुमार, युवक, बसिलापानी

कब हमारे गांव की समस्या दूर होगी. क्या हमलोग इसी प्रकार जीते रहेंगे. मन में कई तरह के सवाल उठते रहते हैं. जिस प्रकार हमारे पूर्वज कष्टों में जीते आये हैं, उसी प्रकार हम जी रहे हैं. बदलाव की उम्मीद है.
दीपक सिंह, ग्रामीण युवक

डहूपानी पंचायत के गांव : डहूपानी पंचायत में बसिलापानी, खड़पानी, बोरहाडीह, ढोलचुआं, छवारीकोना, डहूपानी सहित करीब छोटे बड़े 12 टोले हैं. यहां की 5000 आबादी है.

गांव में पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है. गांव की सरकार का चुनाव हुआ. सांसद भी चुने. विधायक भी चुनते हैं, लेकिन हमारे गांव की समस्या दूर नहीं हो रही है. वोट बैंक बन कर रह गये हैं डहूपानी पंचायत के लोग.
विश्वनाथ सिंह, ग्रामीण युवक

-नक्सल इलाका होने के कारण विकास नहीं हुआ. अब नक्सल खत्म हो रहा है तो प्रशासन व नेता ने मुंह मोड़ लिया है

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