गुमला : छात्र शक्ति ही देश की शक्ति है : सांसद

Updated at : 04 Feb 2019 12:52 AM (IST)
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गुमला : छात्र शक्ति ही देश की शक्ति है : सांसद

गुमला : अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद गुमला के तत्वावधान में आयोजित झारखंड प्रांत जनजातीय छात्र जुटान कार्यक्रम रविवार को ऑडिटोरियम स्टेडियम गुमला में संपन्न हुआ. अंतिम दिन कई वक्ताओं ने अपने संबोधन में छात्र व युवा संगठन के महत्व के बारे में जानकारी दी. छात्र शक्ति, देश शक्ति के नारा के साथ जनजातीय जुटान कार्यक्रम […]

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गुमला : अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद गुमला के तत्वावधान में आयोजित झारखंड प्रांत जनजातीय छात्र जुटान कार्यक्रम रविवार को ऑडिटोरियम स्टेडियम गुमला में संपन्न हुआ. अंतिम दिन कई वक्ताओं ने अपने संबोधन में छात्र व युवा संगठन के महत्व के बारे में जानकारी दी.

छात्र शक्ति, देश शक्ति के नारा के साथ जनजातीय जुटान कार्यक्रम का समापन हुआ़ मौके पर पांच महत्वपूर्ण प्रस्ताव लाया गया. जिससे छात्रों को मजबूती प्रदान की जा सके. वहीं आने वाले दिनों में छात्र संगठन को और मजबूत करने पर बल दिया गया.

जनजातीय समाज भारत का मेरूदंड है : प्रफुल्लकांत
कार्यक्रम के प्रथम पाली में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री प्रफुल्लकांत ने कहा कि ज्ञान के भंडार वाले भारत जिसमें नालंदा व तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय थे. आज उस भारत को लाचार, गरीब व दरिद्र आदि की संज्ञा दी जाती है जो वास्तविकता से परे है. आज का समय है भारत व भारत के युवाओं को अपने सामर्थ्य को समझ कर भारत को विकास के पथ पर लाने की आवश्यकता है.
आप आस्ट्रेलिया व अमेरिका में रह कर आस्ट्रेलिया व अमेरिका को माता अथवा पिता का संबोधन नहीं दे सकते हैं. परंतु भारत एकमात्र ऐसा देश है. जिसे माता की संज्ञा दी जाती है. जनजातीय समाज भारत का मेरूदंड है. आजादी की लड़ाई तथा अंग्रेजों की हुकूमत के समय जनजातीय समाज का योगदान अनुकरणीय है. इसी कारण अंग्रेजों द्वारा जनजातीय समाज को पिछड़ा, गरीब व निकृष्टों की संज्ञा दी गयी. परंतु फिर भी भारत से जनजातीय संस्कृति को वे तोड़ नहीं पाये.
देश के लिए जनजातीय का योगदान महत्वपूर्ण : मिशिर
कार्यक्रम को सफल बनानेवाले युवा नेता मिशिर कुजूर ने कहा कि 1857 की क्रांति में जनजातीय समाज व जनजातीय नेता जैसे तिलका मांझी, सिद्धो कान्हू आदि का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता. वर्तमान में भारत की शिक्षा व्यवस्था में जनजातीय समाज व जनजातीय महापुरुषों के इतिहास को शामिल किया जाना चाहिए.
न कि कार्ल मार्क्स व लेनिन को. जिनका दूर-दूर तक भारत के इतिहास से कोई संबंध नहीं है. इसके बाद विभाग सह बैठक का आयोजन किया गया. इसमें एबीवीपी के वरिष्ठ पदाधिकारी व हर एक जिले के नियंत्रक व छात्रों ने मिल कर कार्यक्रम की समीक्षा की. साथ ही जनजातीय विकास पर सुझाव प्रकट किया.
अंतिम दिन के कार्यक्रम में अभाविप के सागर उरांव, प्रोफेसर हरिकिशोर शाही, मिशिर कुजूर, दीप ज्योति गोप, मुकेश राम, निर्मल सिंह, प्रमुख नाथू गाड़ी, संयोजक गुंजन मरांडी, सह संयोजक शैलेंद्र मरांडी, कार्यक्रम प्रमुख विनोद एक्का, मीडिया प्रभारी कमलकांत दुबे, नियंत्रक सोमनाथ भगत, सह नियंत्रक शिवपूजन सिंह, अशोक मुंडा, सदस्य मिस्त्री मरांडी, डॉ राजीव, डॉ पंकज कुमार, रोशन कुमार, सज्जन जी, पूणोतांक, शशांक, आकाश, राजन, मंजूला, मधु, अनुराधा, कमलकांत दूबे, मोनू, बबन,सौरभ, प्रताप, आशीष, स्वर्णिम राय, पवन पांडेय, मिंकू, प्रांतीय अध्यक्ष प्रोफेसर नाथू गाड़ी, प्रांतीय मंत्री रौशन सिंह, छात्र नेता परीक्षित भगत, प्रेस प्रमुख कमलकांत दुबे सहित आदिवासी छात्र जुटान में विभिन्न जिलों से आये जनजातीय छात्र सहित विभिन्न जिलों से आये पांच हजार से अधिक अभाविप कार्यकर्ता मौजूद थे.
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