गोड्डा के इस गांव में सड़क नहीं, चार किलोमीटर ढोकर मरीज को लाया गया अस्पताल
Published by : KumarVishwat Sen Updated At : 03 Jun 2026 6:44 PM
खाट पर लादकर मरीज को अस्पताल ले जाते परिजन. फोटो: प्रभात खबर
Godda News: गोड्डा के बोआरीजोर प्रखंड स्थित बड़ा केरा गांव में सड़क नहीं होने से घायल युवती सुकुरमुनि पहाड़ीन को चार किलोमीटर तक खाट पर ढोकर घर लाना पड़ा. मेघी पंचायत के दर्जनों पहाड़िया गांव आज भी सड़क सुविधा से वंचित हैं. ग्रामीणों ने प्रशासन से सड़क निर्माण की मांग की है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.
बोआरीजोर से ध्रुव कुमार की रिपोर्ट
Godda News: देश जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और आधुनिक तकनीक के दौर में तेजी से आगे बढ़ रहा है, वहीं झारखंड के गोड्डा जिले में आज भी कई ऐसे गांव हैं जहां सड़क जैसी बुनियादी सुविधा तक उपलब्ध नहीं है. बोआरीजोर प्रखंड की मेघी पंचायत स्थित बड़ा केरा गांव की तस्वीर विकास के दावों पर सवाल खड़े करती है. इस गांव तक पहुंचने के लिए आज भी कोई सड़क नहीं है. परिणामस्वरूप ग्रामीणों को रोजमर्रा के कामों के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थितियों में भी भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. हाल ही में सामने आई एक घटना ने इस समस्या को फिर उजागर कर दिया है.
घायल युवती को खाट पर ढोकर पहुंचाया गया घर
बड़ा केरा गांव की रहने वाली 18 वर्षीय सुकुरमुनि पहाड़ीन गंभीर रूप से घायल हो गई थी. जानकारी के अनुसार वह अपने मामा के घर साहिबगंज जिले के मंडरो प्रखंड स्थित डोरा गांव गई हुई थी. इसी दौरान घर की छत से गिरने के कारण उसे गंभीर चोटें आईं. परिजनों ने पहले उसे साहिबगंज अस्पताल में भर्ती कराया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद चिकित्सकों ने बेहतर इलाज के लिए रांची रेफर कर दिया. इलाज के बाद जब परिजन उसे वापस गांव लेकर पहुंचे, तब सड़क नहीं होने की समस्या सामने आ गई.
मेघी चौक से चार किलोमीटर तक खाट पर सफर
सुकुरमुनि के पिता डोमा पहाड़िया ने बताया कि वाहन से किसी तरह मरीज को मेघी चौक तक लाया गया. लेकिन वहां से बड़ा केरा गांव तक पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं है. ऐसे में परिवार और ग्रामीणों ने बांस की खाट का सहारा लिया और घायल युवती को करीब चार किलोमीटर तक कंधों पर ढोकर गांव पहुंचाया. भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बीच यह सफर परिवार के लिए बेहद कठिन साबित हुआ. रास्ते की दुर्गमता और सड़क के अभाव ने उनकी परेशानी कई गुना बढ़ा दी.
दर्जनों गांवों के लोग झेल रहे हैं परेशानी
ग्रामीणों का कहना है कि बड़ा केरा ही नहीं, बल्कि मेघी पंचायत के दर्जनों पहाड़िया गांव आज भी सड़क सुविधा से वंचित हैं. इन गांवों के लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सेवाओं तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है. आपातकालीन परिस्थितियों में मरीजों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को अस्पताल तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है. कई बार लोगों को खाट या अस्थायी स्ट्रेचर के सहारे मरीजों को ढोना पड़ता है.
कई बार दिया गया आवेदन, नहीं हुई कार्रवाई
मरीज के परिजनों ने बताया कि गांव तक सड़क निर्माण की मांग को लेकर कई बार प्रखंड प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को लिखित आवेदन दिया गया है. बावजूद इसके अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई है. ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से मांग उठाने के बावजूद प्रशासन ने इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया. इससे इलाके के लोगों में निराशा बढ़ रही है.
बरसात में और विकराल हो जाती है समस्या
मेघी पंचायत के मुखिया मनोज मरांडी ने बताया कि पंचायत के दर्जनों पहाड़िया गांव सड़क सुविधा से वंचित हैं. उन्होंने कहा कि कई बार जिला प्रशासन को पत्र लिखकर सड़क निर्माण की मांग की गई, लेकिन अब तक कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई. मुखिया के अनुसार बरसात के मौसम में हालात और खराब हो जाते हैं. कच्चे रास्तों पर कीचड़ भर जाने के कारण पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है. ऐसे समय में मरीजों को अस्पताल पहुंचाना लगभग असंभव हो जाता है.
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विकास के दावों पर उठ रहे सवाल
सुकुरमुनि पहाड़ीन को चार किलोमीटर तक खाट पर ढोकर ले जाने की घटना ने एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को सामने ला दिया है. स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि बड़ा केरा सहित आसपास के सभी पहाड़िया गांवों को जल्द सड़क सुविधा से जोड़ा जाए, ताकि भविष्य में किसी परिवार को ऐसी पीड़ा और कठिनाई का सामना न करना पड़े.
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By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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