नौ दिनों तक भक्तिमय रहता है क्षेत्र
सरिया प्रखंड की पूरनीडीह पंचायत में 125 वर्षों से चैती दुर्गा पूजा हो रही है. यहां ग्रामीण क्षेत्र के लोग नौ दिनों तक व्रत में रहकर मां दुर्गा की आराधना करते हैं. दसवें दिन भव्य मेले का आयोजन होता है. पूजा के आयोजक अवध किशोर प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद व परिजन ने बताया कि उनके पूर्वजों में मां देवी के एक भक्त हुआ करते थे. उन्होंने अपने हाथ से लोहे की एक जंजीर को फेंका और कहा कि जहां यह गिरेगा वहां मां दुर्गा की मंदिर की स्थापना कर स्थायी पूजा की जानी चाहिए. उनकी बातों को ध्यान में रखकर वासंतिक दुर्गापूजा आयोजक समिति के धरोहर माने जाने वाले लक्ष्मण प्रसाद तथा देवकीनंदन सहाय ने लोहे की जंजीर गिरे हुए स्थल पर वर्ष 1900 में खपड़ैल का एक छोटा सा मंदिर बनवाया. इसमें चैता दुर्गा पूजा शुरू की गयी. कहा कि जंगलों से घिरे इस क्षेत्र में आवागमन की सुविधा नहीं थी. लोगों को मेला देखने के लिए 25 किमी दूर सरिया बाजार या डुमरी जाना पड़ता था. परंतु, यहां जब मूर्ति पूजा शुरू हुई तो लोग अपने क्षेत्र में ही पूरे नौ दिनों तक व्रत में रहकर मां दुर्गा की पूजा कर आशीर्वाद मांगने लगे. पूजा में पूर्व में स्थानीय ग्रामीण से आर्थिक सहयोग राशि प्राप्त होती थी. लेकिन, वर्तमान समय में पूजा में होने वाली सभी खर्च संस्थापक परिवार स्वयं वहन करते हैं. वर्ष 1972 नंदकिशोर प्रसाद के परिजनों ने पक्का मंदिर का निर्माण करवाया. वर्ष 2012-13 में पुनः उस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया. मंदिर परिसर में मेला के लिए नंदकिशोर प्रसाद के परिजनों ने जमीन की व्यवस्था भी की. इस जमीन पर दशमी को मेला लगता है.बलि देने की है प्रथा
नवमी तिथि को भी सरकारी पूजा के बाद ग्रामीण अपनी मनोकामना पूरी होने पर बकरे की बलि देते हैं. इस क्षेत्र का मूर्ति पूजा का इकलौता पंडाल होने के कारण सिंहडीह, कोयरीडीह, पुरनीडीह, सिंहडीह, मोकामो, रतनाडीह, मुहर, ढबिया, खेशकरी, कैलाटांड़ के लोग मेले का आनंद लेते हैं. वर्ष 1984 से नवमी के दिन उत्साह के साथ महावीर झंडा निकलता है, जो पूरे गांव में भ्रमण करता है. इस धार्मिक जुलूस को शांतिपूर्ण संपन्न करने के लिए समिति का गठन भी किया गया है, जिसकी देखरेख में रामनवमी पूजा होती है.
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