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चेरापूंजी बन गया गढ़वा, आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं किसान

Updated at : 12 Jul 2025 10:45 PM (IST)
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चेरापूंजी बन गया गढ़वा, आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं किसान

गढ़वा जिला इन दिनों मेघालय के चेरापूंजी जैसा नजर आ रहा है.

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पीयूष तिवारी, गढ़वा गढ़वा जिला इन दिनों मेघालय के चेरापूंजी जैसा नजर आ रहा है. पिछले एक महीने से यहां लगातार बारिश हो रही है, जिससे आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है. बारिश कब होगी, इसका कोई तय वक्त नहीं कभी सुबह, कभी दोपहर, तो कभी रात में भी मूसलधार बारिश हो रही है.

फुटपाथी दुकानदारों की कमाई पर असर

बारिश से सबसे अधिक नुकसान उन किसानों और छोटे दुकानदारों को हुआ है, जो खुले में काम करते हैं. ठेले और फुटपाथ पर सामान बेचने वालों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा है. साथ ही फल और सब्जियों के दाम भी काफी बढ़ गये हैं.

आद्रा नक्षत्र से पहले ही शुरू हो गयी बारिश

इस बार मॉनसून ने समय से पहले दस्तक दे दी. आमतौर पर खेती लायक बारिश आद्रा नक्षत्र (22 जून) के आसपास होती है. लेकिन इस वर्ष 15 जून को ही पहली भारी बारिश हुई, जिसे मॉनसून की शुरुआत माना जा रहा है. तब से 11 जुलाई तक सिर्फ एक दिन (9 जुलाई) को छोड़कर हर दिन बारिश दर्ज की गयी है.

जून और जुलाई की बारिश सामान्य से अधिक

जून में सामान्यत: 138.8 मिमी बारिश होती है, लेकिन इस बार 158.8 मिमी बारिश सिर्फ 15 से 30 जून के बीच हुई. वहीं जुलाई के पहले 11 दिनों में ही 85.1 मिमी वर्षा रिकॉर्ड की गयी है. लेकिन चिंता की बात यह है कि बारिश ज्यादा है, पर खेती का काम नहीं हो पा रहा. धान की रोपाई पूरी तरह ठप, अन्य फसलों की स्थिति भी खराब है.

जिला कृषि कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार

धान: 56400 हेक्टेयर लक्ष्य के विरुद्ध रोपाई शून्य

मक्का: 27650 हेक्टेयर में लक्ष्य, लेकिन केवल 3927 हेक्टेयर (14.20%)

अरहर: 29800 हेक्टेयर लक्ष्य के विरुद्ध केवल 4255 हेक्टेयर (14.28%)

उड़द: 8180 हेक्टेयर लक्ष्य के विरुद्ध 320 हेक्टेयर (3.91%)

मूंग: 1410 हेक्टेयर लक्ष्य के विरुद्ध केवल 5 हेक्टेयर (0.35%)

तिल: 2050 हेक्टेयर लक्ष्य के विरुद्ध 370 हेक्टेयर (18.05%)

मूंगफली: 2970 हेक्टेयर के विरुद्ध 530 हेक्टेयर (17.85%)

मडुआ: 3400 हेक्टेयर लक्ष्य के विरुद्ध मात्र 20 हेक्टेयर (0.55%)

कम अवधि की फसलें और जल प्रबंधन की सलाह

केविके प्रधान राजीव कुमार ने किसानों को सुझाव दिया है कि वे टांड़ भूमि में कम अवधि वाली फसलें जैसे तिल, अरहर और मकई बोएं. साथ ही खेतों में जल निकासी की उचित व्यवस्था करें और धान प्लॉट में मेड़बंदी करके पानी संचित करें. उन्होंने लेवा विधि से बिचड़ा तैयार करने की सलाह दी, ताकि रोपाई जल्द शुरू की जा सके.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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