बुजुर्ग अपनी सासंकृतिक पहचान को बचाये रखने के लिए संघर्षरत

मेहनत के अपेक्षा आमदनी नहीं होने से पारंपरिक उद्योग से दूर हो रही युवा पीढ़ी
मेहनत के अपेक्षा आमदनी नहीं होने से पारंपरिक उद्योग से दूर हो रही युवा पीढ़ी अभिमन्यु कुमार, खरौंधी गढ़वा जिले के खरौंधी प्रखंड में कुम्हारों की आबादी अच्छी खासी है. कभी यह पेशा ग्रामीण जीवन और संस्कृति का अहम हिस्सा था, लेकिन अब युवा पीढ़ी अपने पारंपरिक उद्योग से लगातार दूर होती जा रही है. कुम्हार समुदाय के लोगों का कहना है कि पारंपरिक कार्य में मेहनत बहुत है, लेकिन आमदनी अपेक्षाकृत कम होती है. बेहतर शिक्षा, रोजगार और शहरी जीवन की आकांक्षा के कारण युवा अब इस धंधे में भविष्य या सम्मान नहीं देखते. वहीं, बुजुर्ग आज भी अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपरा को बचाए रखने के लिए संघर्षरत हैं. दीपावली के मौके पर इन कारीगरों के लिए यह प्रमुख सीजन होता है. इस दौरान वे घरों को रोशन करने के लिए मिट्टी के दीये, ढकनी, कलश, घड़ा, सुराही, टुंईया और अन्य बर्तनों का निर्माण करते हैं. इन्हें स्थानीय बाजारों में बेचकर कुछ आमदनी होती है, लेकिन अब चाक के पहिये अधिकतर घरों में थम गये हैं. केवल बुजुर्ग या आर्थिक रूप से कमजोर लोग ही इस परंपरा को निभा रहे हैं. मिट्टी के बर्तनों की लागत बढ़ गयी है, जबकि बिक्री घटती जा रही है. लकड़ी के दाम बढ़ने से निर्माण महंगा पड़ता है. दूसरी ओर, लोग अब एलुमिनियम, स्टील और प्लास्टिक के बर्तनों की ओर तेजी से मुड़ रहे हैं. दीपावली पर चाइनीज झालरों और इलेक्ट्रिक लाइटों ने मिट्टी के दीयों की जगह ले ली है. कुम्हारों की व्यथा और उम्मीदें – मिट्टी का घड़ा, दीपक और ढकनी पहले की तुलना में अब महंगे पड़ रहे हैं, लेकिन वे अब भी मिट्टी के चाक पर बर्तन बनाना नहीं छोड़ना चाहते. उन्होंने कहा कि यह परंपरा बचे, यह हमारी इच्छा है, लेकिन शासन-प्रशासन की प्राथमिकता में यह उद्योग नहीं है. – उमाशंकर प्रजापति – मिट्टी के बर्तन बनाने में बहुत मेहनत लगती है, पर मेहनत के अनुसार दाम नहीं मिलता. लकड़ी का दाम आसमान छू रहा है. सरकार की ओर से बाजार उपलब्ध कराने की पहल नहीं होती, इसलिए हम निराश हैं. – सुरेश प्रजापति – अब समय बदल गया है. लोग मिट्टी के घड़े की जगह फ्रीज का उपयोग कर रहे हैं. मिट्टी के बर्तनों की मांग घटी है. फिर भी सुकून की बात यह है कि अब कुछ लोग स्वास्थ्य कारणों से मिट्टी के बर्तनों का महत्व समझने लगे हैं. – योगेंद्र प्रजापति – दीपावली पर लोग मिट्टी के दीये जलाने की बात तो करते हैं, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं होता. पहले खपड़ा (मिट्टी की छत की टाइल) की मांग से भी अच्छी कमाई होती थी, अब वह भी बंद हो गयी है. – दुखी प्रजापति – सरकार की ओर से इलेक्ट्रिक चाक और भट्टियां बांटने की योजना बनी है, लेकिन खरौंधी प्रखंड में अब तक किसी को इसका लाभ नहीं मिला है. – बिरेंद्र प्रजापति तकनीक और प्रशिक्षण से लौट सकती है पुरानी रौनक मिट्टी के पारंपरिक उद्योग को बचाने के लिए अब आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षण की जरूरत महसूस की जा रही है. कुम्हारों को इलेक्ट्रिक चाक, ऊर्जा-कुशल भट्टियां और विपणन की सुविधा देने की योजना तो है, पर यह अब तक खरौंधी जैसे इलाकों में नहीं पहुंच पायी है. स्थानीय कारीगरों का कहना है कि यदि सरकार और प्रशासन इस पर गंभीरता से काम करे तो उत्पादन की गति बढ़ेगी, गुणवत्ता में सुधार होगा और आय तीन से चार गुना तक बढ़ सकती है. वे यह भी सुझाव देते हैं कि पारंपरिक बर्तनों के साथ-साथ आधुनिक डिजाइन के सिरेमिक और सजावटी वस्तुओं का प्रशिक्षण दिया जाये. स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के लिए मिट्टी के कुकवेयर बनाने की दिशा में भी पहल होनी चाहिए. युवा कुम्हारों का कहना है कि उनके उत्पादों की ब्रांडिंग और विपणन भी जरूरी है, ताकि उन्हें बाजार में उचित पहचान और सम्मान मिल सके. उनका मानना है कि यदि शासन स्तर से प्रोत्साहन मिला तो एक बार फिर चाक के पहिये पूरे जोश से घूमने लगेंगे.
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