तीन एएनएम के भरोसे 62 हजार लोग

Published at :25 May 2015 8:56 AM (IST)
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तीन एएनएम के भरोसे 62 हजार लोग

डंडई में चिकित्सा व्यवस्था चरमरायी, ओपीडी भी चार माह से बंद स्वास्थ्य केंद्र में एक भी चिकित्सक नहीं हैं. स्थापना काल से ही प्रभार में चल रहा है अस्पताल. चार माह पूर्व प्रभारी चिकित्सक का तबादला गढ़वा हो गया. तब से ओपीडी भी बंद पड़ा है. डंडई (गढ़वा) : सरकार बुनियादी सुविधाओं को बहाल करने […]

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डंडई में चिकित्सा व्यवस्था चरमरायी, ओपीडी भी चार माह से बंद
स्वास्थ्य केंद्र में एक भी चिकित्सक नहीं हैं.
स्थापना काल से ही प्रभार में चल रहा है अस्पताल.
चार माह पूर्व प्रभारी चिकित्सक का तबादला गढ़वा हो गया.
तब से ओपीडी भी बंद पड़ा है.
डंडई (गढ़वा) : सरकार बुनियादी सुविधाओं को बहाल करने का लाख ढ़िढोरा पीटे, लेकिन धरातल पर सरकार का दावा खोखला साबित हो रहा है. सूबे के स्वास्थ्य मंत्री गढ़वा के रहने वाले हैं. बावजूद जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल काफी खराब है.
उनके स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद जिले के लोगों में हर्ष व्याप्त हुआ था कि अब उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो सकेगी. लेकिन तीन महीने के बाद भी स्वास्थ्य सेवाओं में कोई सुधार नहीं होने से लोगों में निराशा बढ़ी है. बासठ हजार की आबादी वाले डंडई प्रखंड मुख्यालय स्थित स्वास्थ्य केंद्र के ओपीडी में पिछले चार माह से ताला लटका हुआ है. जिससे प्रखंड के लोगों को इलाज कराने के लिए गढ़वा जिला मुख्यालय आना पड़ता है.
आठ वर्ष पूर्व डंडई प्रखंड मुख्यालय में स्वास्थ्य केंद्र का निर्माण कराया गया था, तो लोगों में उत्साह देखा गया था और प्रखंड के लोगों ने यह उम्मीद जतायी थी कि अब उन्हें छोटी-मोटी बीमारियों के लिए जिला मुख्यालय नहीं जाना पड़ेगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. स्वास्थ्य केंद्र बनने के बावजूद लोगों को इसका लाभ नहीं मिल सका. डंडई स्वास्थ्य केंद्र में एक चिकित्सक, चार एएनएम, एक दाई व एक रात्रि प्रहरी का पद स्वीकृत है. लेकिन वर्तमान में यहां कोई चिकित्सक नहीं हैं. जबकि तीन एएनएम व रात्रि प्रहरी हैं.
चिकित्सक के नहीं रहने से पूरा सिस्टम फेल है. स्वास्थ्य केंद्र के स्थापना काल से ही अब तक यहां नियमित चिकित्सक की पदस्थापना नहीं की गयी है. इसके पूर्व डॉ जितेंद्र कुमार से अतिरिक्त प्रभार के तहत यहां काम कराया जाता था. लेकिन चार माह पूर्व उन्होंने अपना तबादला गढ़वा सदर अस्पताल में करा लिया. तब से ओपीडी का ताला नहीं खुला है. गर्भवती महिलाओं के प्रसव कराने की यहां कोई व्यवस्था नहीं है. छोटी-मोटी बीमारियों में भी लोगों को बाहर जाना पड़ता है.
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