लोग इलाज के लिए पड़ोसी राज्य पर निर्भर
अस्पताल खोलने के सभी प्रयास विफल साबित हुए
चुनाव में बनता है मुद्दा, फिर साध ली जाती है चुप्पी
प्रतिनिधि, मुसाबनी
हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (एचसीएल) की ताम्र खदानों बंद होने के बाद 2001 में बंद हुआ मुसाबनी माइंस अस्पताल अब पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुका है. झारखंड गठन के बाद 350 शैय्या वाले इस आधुनिक अस्पताल को पुनः चालू करने के सारे प्रयास विफल रहे. छत पर पेड़ उग आये हैं, छज्जे टूट रहे हैं, भवन दरारों से भरा है और चारों ओर झाड़ियां घेरे हुए हैं.
नेताओं व संगठनों के प्रयास बेकार
झारखंड के पहले स्वास्थ्य मंत्री डॉ. दिनेश षाड़ंगी ने अस्पताल को पुनः चालू करने की पहल की. मणिपाल यूनिवर्सिटी ने मेडिकल कॉलेज खोलने की रुचि दिखायी. शारदा ट्रस्ट ने भी प्रयास किया. सांसद, विधायक व सामाजिक संगठनों की बार-बार मांग के बावजूद सफलता नहीं मिली. पहले माइंस कर्मियों के साथ डुमरिया, गुड़ाबांदा, मुसाबनी व घाटशिला प्रखंड के ग्रामीणों को यहां चिकित्सा सुविधा मिलती थी. अब इलाज के लिए जमशेदपुर या पड़ोसी राज्यों बंगाल-ओडिशा पर निर्भरता है. आर्थिक रूप से कमजोर लोग समय पर उचित इलाज से वंचित हैं. क्षेत्रवासियों में निराशा गहरा रही है.
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