सरेंडर से झारखंड व बंगाल में नक्सल आंदोलन हुआ प्रभावित

Updated at : 05 Apr 2017 5:30 AM (IST)
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सरेंडर से झारखंड व बंगाल में नक्सल आंदोलन हुआ प्रभावित

गालूडीह : पोलित ब्यूरो सदस्य कोटेश्वर राव के मारे जाने के बाद वर्ष 2012 से सरेंडर का दौर चल रहा है. माओवादियों के सरेंडर से झारखंड व बंगाल में नक्सल आंदोलन पर गहरा प्रभाव पड़ा है. पश्चिम बंगाल के नक्सल प्रभावित तीन जिले पश्चिमी मेदिनीपुर, बांकुड़ा और पुरुलिया तथा झारखंड के पूर्वी सिंहभूम से नक्सलवाद […]

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गालूडीह : पोलित ब्यूरो सदस्य कोटेश्वर राव के मारे जाने के बाद वर्ष 2012 से सरेंडर का दौर चल रहा है. माओवादियों के सरेंडर से झारखंड व बंगाल में नक्सल आंदोलन पर गहरा प्रभाव पड़ा है. पश्चिम बंगाल के नक्सल प्रभावित तीन जिले पश्चिमी मेदिनीपुर, बांकुड़ा और पुरुलिया तथा झारखंड के पूर्वी सिंहभूम से नक्सलवाद खात्मे की ओर है.

हालांकि वर्ष 2009 में जब लालगढ़ आंदोलन चरम पर था, तब एक इंटरव्यू में पोलित ब्यूरो सदस्य कोटेश्वर राव ने कहा था माओवाद विचार है. विचार कभी मरता नहीं. हां समय और परिस्थिति के अनुरूप संगठन समय-समय पर कमजोर जरूर होता है.

सरेंडर से संगठन में आया बिखराव : बंगाल और झारखंड में नक्सलियों का लगातार सरेंडर से संगठन में बिखराव आ गया है. कल माओवादियों की जितनी धमक थी, वह आज नहीं है. धीरे-धीरे संगठन शिथिल पड़ रहा है. बड़े नेता भागे फिर रहे हैं. कैडर संगठन छोड़ रहे हैं. गांव में उनका वर्चस्व कम हो गया है. सरकार ग्रामीणों को मुख्यधारा से जोड़ रही है. बीहड़ों में रास्ते बन रहे हैं. बिजली पहुंची है.
पंचायती व्यवस्था से राजनीतिक जागरूकता आयी है. इन कारणों से एक तरह से दोनों राज्यों की नक्सल प्रभावित जिलों, प्रखंडों और थाना क्षेत्रों में नक्सलवाद अब सफाये की ओर है.
बंगाल के तीन जिले व झारखंड का पूर्वी सिंहभूम में नक्सलवाद खात्मे की ओर
नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ था नक्सलवाद
वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से नक्सलवाद शुरू हुआ था. सशस्त्र विप्लव के माध्यम से समाजवाद स्थापित करने के लिए तब सीपीआइ (एमएल) के प्रमुख नेता चारू मजूमदार, कन्हाई चटर्जी, जंगल संताल, कान्हु सानायल आदि के नेतृत्व में सशस्त्र आंदोलन शुरू हुआ था. यह आंदोलन 1967 से 1977 तक चला. आंदोलन का मुख्य उद्देश्य सामांतवाद के खिलाफ था. जमींदारों की जमीन छिन कर भूमिहीनों के बीच बांट दी जाती थी. इस आंदोलन के बाद सीपीआइ (एमएल) में बिखराव हुआ. एक पक्ष लोकतांत्रित तरीके से आंदोलन करने और चुनाव में आने के पक्षधर था, तो दूसरा पक्ष बंदूक के बल पर सशस्त्र आंदोलन का पक्षधर था. इस समय पार्टी टूटी और बिखराव होता गया. वर्तमान में देश भर में सशस्त्र आंदोलन पर विश्वास रखने वाले करीब 37 संगठन काम कर रहे हैं, जो प्रतिबंधित हैं.
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