ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ शुरू हुई थी मां दुर्गा की पूजा

गालूडीह : घाटशिला प्रखंड के पायरागुड़ी में भूमिज राजाओं द्वारा ब्रिटिश हुकूमत को परास्त करने के लिए 1760 ई में शक्ति की देवी मां दुर्गा की पूजा शुरू की गयी थी. तब मानभूम के जंगल महल में ब्रिटिश लेफ्टिनेट फारगुसेन अपना कब्जा जमाना जाता था. ब्रिटिश हुकूमत को परास्त करने के लिए भूमिज राजा क्षेत्र […]
गालूडीह : घाटशिला प्रखंड के पायरागुड़ी में भूमिज राजाओं द्वारा ब्रिटिश हुकूमत को परास्त करने के लिए 1760 ई में शक्ति की देवी मां दुर्गा की पूजा शुरू की गयी थी. तब मानभूम के जंगल महल में ब्रिटिश लेफ्टिनेट फारगुसेन अपना कब्जा जमाना जाता था.
ब्रिटिश हुकूमत को परास्त करने के लिए भूमिज राजा क्षेत्र मोहन सिंह ने शक्ति की देवी की पूजा शुरू की. इसी दौरान वीरबांस से दो तलवार मिले थे. एक बड़ा तलवार था जिसका नाम विजया और छोटे तलवार का नाम जया रखा गया था. उक्त दोनों तलवार आज भी पायरागुड़ी निवासी भूमिज राजा के वंशज बासंती प्रसाद सिंह के घर में महफूज है.
दुर्गा पूजा के उक्त तलवारों को निकाला जाता है. नहला कर नये वस्त्र धारण कराये जाते हैं. एक और तलवार है जो आदि रंकिणी मंदिर के मिले थे.उक्त सभी तलवारे मां दुर्गा के प्रतिक के रूप में संयोज कर रखे गये हैं. वंशज बासंती प्रसाद सिंह ने कहा कि 1832 में यहां पहली बार मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित कर पूजा शुरू की गयी.
यहां दुर्गा को बेटी मान पूजते हैं
बांसती प्रसाद सिंह ने कहा कि यहां देवी दुर्गा को केवल देवी नहीं बल्कि बेटी मान लोग पूजते हैं, इसलिए कुलाचार के अनुसार विजया दशमी के विसर्जन के दिन पांतो भात (बासी भात) और झिंगा पोड़ा का भोग लगाया जाता है. जैसे घर की बेटी जब अचानक ससुराल जाने के लिए तैयार होती है तब माता-पिता जल्दी बाजी में जैसे खाना बनाते हैं उसी प्रकार दुर्गा देवी के विसर्जन के दिन भोग दिया जाता है.
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