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धालभूमगढ़ : आदिम जनजाति सबर के छह की सिलकोसिस से मौत

Updated at : 05 Nov 2018 6:11 AM (IST)
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धालभूमगढ़ : आदिम जनजाति सबर के छह की सिलकोसिस से मौत

रंजीत महतो मानवाधिकार आयोग को प्रेषित रिपोर्ट से मामले का खुलासा सरकार के पास नहीं है सिलकोसिस जांच की प्रयोगशाला नर्सिंग होम, क्लीनिक नहीं देते हैं पीड़ित मजदूरों को प्लेट धालभूमगढ़ : आदिम जनजाति के छह सबरों की मौत सिलकोसिस रोग से होने का मामला प्रकाश में आया है. सिलकोसिस से धालभूमगढ़ प्रखंड क्षेत्र की […]

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रंजीत महतो

मानवाधिकार आयोग को प्रेषित रिपोर्ट से मामले का खुलासा

सरकार के पास नहीं है सिलकोसिस जांच की प्रयोगशाला

नर्सिंग होम, क्लीनिक नहीं देते हैं पीड़ित मजदूरों को प्लेट

धालभूमगढ़ : आदिम जनजाति के छह सबरों की मौत सिलकोसिस रोग से होने का मामला प्रकाश में आया है. सिलकोसिस से धालभूमगढ़ प्रखंड क्षेत्र की कई महिलाओं की मौत हुई है.

ओशाज के महासचिव समीत कर ने पूर्वी सिंहभूम के एडीसी और मानवाधिकार आयोग को प्रेषित रिपोर्ट से मामले का खुलासा हुआ है. ओशाज के महासचिव समीत कर ने बताया कि धालभूमगढ़ के जड़शोल के क्वार्टज उद्योग में लगभग 200 मजदूरों ने काम किया है. इसमें से 82 मजदूरों का एक्स-रे प्लेट की मेडिकल और क्लीनिकल रिपोर्ट है, जो मजदूर सिलकोसिस से पीड़ित हैं. इनमें से कई की मौत हो चुकी है. उन्होंने बताया कि आदिम जनजाति की सबर महिलाओं की मौत गंभीर मामला है.

ओशाज और अन्य सामाजिक संस्था की जांच से यह स्पष्ट है कि क्वार्टज उद्योग में काम करनेवाले मजदूर दो तरह से प्रभावित होते हैं. पहला सिलका कण प्रभावित मजदूर और दूसरा सिलकोसिस रोग से प्रभावित मजदूर. कई मजदूरों का एक्स-रे प्लेट और मेडिकल रिपोर्ट है और कई मजदूरों का नहीं है.

सरकारी योजनाएं के लाभ से वंचित हैं सबर : सरकार विलुप्त होती आदिम जनजाति सबरों को बचाने के लिए विभिन्न प्रकार की योजनाएं चला रही हैं.

महिलाओं के लिए महिला सशक्तीकरण जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं चलायी जा रही हैं. दूसरी तरफ सिलकोसिस से सबरों और महिलाओं की मौत हो रही है. क्वार्टज उद्योगों में काम करने वाले मजदूर जब खांसी और सांस की बीमारी से पीड़ित होते हैं, तो स्थानीय चिकित्सकों से इलाज कराते हैं. उन्हें एक्स-रे प्लेट नहीं दिया जाता है. जांच रिपोर्ट में सिलकोसिस भी नहीं लिखा जाता है. वर्ष 2016 सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सभी क्वार्टज उद्योगों को टीम द्वारा जांच करनी थी. धालभूमगढ़ के क्वार्टज उद्योग को जांच से बाहर रखा गया.

समीत कर ने बताया कि सिलकोसिस पीड़ित रोगियों को टीबी या अन्य रोग की गलत रिपोर्ट बनानेवाले निजी नर्सिंग होम, क्लीनिक और सरकारी संस्था के चिकित्सकों के विरूद्ध गलत डायग्नोसिस करने के लिए कोर्ट में रिट पिटिशन दायर करेंगे. सिलकोसिस जांच के लिए सरकार के पास प्रयोगशाला नहीं है.

रिपोर्ट के मुताबिक इनकी हो चुकी है मौत : ओशाज की रिपोर्ट के मुताबिक सिलकोसिस से सुरेन सबर, कार्तिक सबर, कालाचांद सबर, शंभू सबर, पुटु सबर, गुरु चरण सबर की मौत हुई है. भोदो सबर, रूपचांद सबर, हरि सबर पीड़ित हैं.

सिलकोसिस से मुखी किस्कू, जासमीन किस्कू, सिंगो मुर्मू, कांद्रा मुर्मू, सालगे मांडी नामक महिलाओं की मौत हुई है. कई महिलाएं पीड़ित हैं. समीत कर के मुताबिक पूर्वी सिंहभूम के क्वार्टज उद्योगों में काम करने वाले मुसाबनी, डुमरिया, पोटका और धालभूमगढ़ प्रखंड में अभी तक 500 मजदूरों की मौत हुई है. इस बीमारी से कई मजदूर पीड़ित हैं.

क्या है सिलकोसिस

चिकित्सकों के मुताबिक सिलकोसिस एक गंभीर बीमारी है. यह फेफड़े में होने वाली बीमारी है. इसका मुख्य कारण वातावरण में मौजूद सिलिका कण है. यह हानिकारक होता है. सांस के जरिये फेफड़े में जमा होता है.

इससे व्यक्ति को सांस लेने में दिक्कत होती है. यह अन्य बीमारियों का कारण बनती है. अंत में रोगी की मौत होती है. खदान और क्रशर में काम करनेवाले मजदूर इससे पीड़ित होते हैं. मजदूरों के गंभीर हालत में पहुंचने के बाद बीमारी का पता चलता है. उस समय काफी देर हो चुकी होती है. ऐसी स्थिति में सिलकोसिस हो चुकी होती है. ऐसी स्थिति में सिलकोसिस के शिकार मरीज को बचाना मुश्किल होता है. मजदूरों के गरीब होने के कारण सही ढंग से इलाज नहीं करा पाते हैं. इसके कारण उनकी असमय मौत हो जाती है.

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