माओवादी एरिया कमेटी की निष्क्रियता से नेतृत्व चिंतित
Updated at : 21 Dec 2017 5:19 AM (IST)
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झारखंड-बंगाल बॉर्डर. पुलिस व सूचना तंत्र की हरकत बढ़ी गालूडीह : झारखंड-बंगाल सीमावर्ती बीहड़ इलाकों में एक समय माओवादियों का राज कायम था. कई इलाके व गांवों को माओवादियों ने मुक्ताचंल घोषित कर दिया था. वहां उनके इजाजत के बगैर कुछ नहीं होता था. आज स्थिति इसके उलट है. इसका सबसे बड़ा कारण पुलिसिया और […]
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झारखंड-बंगाल बॉर्डर. पुलिस व सूचना तंत्र की हरकत बढ़ी
गालूडीह : झारखंड-बंगाल सीमावर्ती बीहड़ इलाकों में एक समय माओवादियों का राज कायम था. कई इलाके व गांवों को माओवादियों ने मुक्ताचंल घोषित कर दिया था. वहां उनके इजाजत के बगैर कुछ नहीं होता था. आज स्थिति इसके उलट है. इसका सबसे बड़ा कारण पुलिसिया और सूचना तंत्र की सक्रियता से माओवादियों की एरिया कमेटी निष्क्रिय हो गयी है. एरिया कमेटी ने अब काम करना बंद कर दिया है. एरिया कमेटी में शामिल लोकल सदस्यों में अधिकांश पलायन कर गये हैं. इससे सीपीआइ माओवादी के पोलित ब्यूरो, सेंट्रल, जोनल, रिजनल कमेटी के शीर्ष माओवादी नेता चिंतित हैं.
भूमिगत रह कर आकाश उर्फ राकेश खुद संभाल रहे मोर्चा : क्षेत्र में पश्चिम बंगाल स्टेट कमेटी के सचिव आकाश उर्फ राकेश जी भूमिगत होकर खुद मोर्चा संभाल रहे हैं. खबर है कि उनके साथ 12 से 14 की संख्या में सशस्त्र माओवादी हैं. जो इलाके में अपनी जान बचाते हुए विचरण कर रहे हैं. एरिया कमेटी की निष्क्रियता के कारण बड़े नेताओं को संगठन विस्तार करने में परेशानी हो रही है. इतना ही नहीं बीहड़ गांवों में संगठन के विचारों को पहुंचाना मुश्किल हो रहा है. ऊपर से पुलिस की सक्रियता के कारण माओवादियों ने अब खुलेआम अपनी गतिविधियां लगभग बंद कर दी है. सीमावर्ती इलाकों में केशरपुर, भोमराडीह, कालचिती, काड़ाडुबा आदि कई जगहों पर स्थायी पुलिस पिकेट के कारण माओवादियों की गतिविधियों पर एक तरह से ब्रेक लग गया है.
एरिया कमेटी की निष्क्रियता से संगठन की गतिविधियां ठप
एमजीएम, गालूडीह, घाटशिला, धालभूमगढ़ और चाकुलिया थाना क्षेत्र का उत्तरी इलाका, जो बंगाल सीमा से सटा है. इस क्षेत्र में पहले एरिया कमेटी सक्रिय थी. संगठन का दबदबा था. राहुल उर्फ रंजीत पाल और उसकी पत्नी झरना का कोलकाता पुलिस मुख्यालय में सरेंडर के बाद से स्थिति बदल गयी. तब से एरिया कमेटी लगभग निष्क्रिय हो गयी. सूचना है कि लोकल स्तर के कई कैडर संगठन छोड़ कर भाग गये. शीर्ष नेतृत्व के समक्ष इसे लेकर चिंता है.
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