पत्थर उत्खनन कर धीरे-धीरे पहाड़ निगल रहे माफिया

Published at :01 Sep 2016 5:59 AM (IST)
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पत्थर उत्खनन कर धीरे-धीरे पहाड़ निगल रहे माफिया

सादीपुर महावीरजी आश्रम पहाड़ी, बांसकुली पहाड़ी व चड़कापाथर पहाड़ का अस्तित्व खतरे में बेरोकटोक ढोया जा रहा पत्थर, विभाग मौन दिन के उजाले में रानीबहाल व आसनबनी वनक्षेत्र से पत्थरों का हो रहा धड़ल्ले से अवैध उत्खनन साधन सेन दुमका : जिले के हिजला पूर्वी क्षेत्र के रानीबहाल व आसनबनी वनक्षेत्र के विभिन्न पहाड़ियों से […]

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सादीपुर महावीरजी आश्रम पहाड़ी, बांसकुली पहाड़ी व चड़कापाथर पहाड़ का अस्तित्व खतरे में

बेरोकटोक ढोया जा रहा पत्थर, विभाग मौन
दिन के उजाले में रानीबहाल व आसनबनी वनक्षेत्र से पत्थरों का हो रहा धड़ल्ले से अवैध उत्खनन
साधन सेन
दुमका : जिले के हिजला पूर्वी क्षेत्र के रानीबहाल व आसनबनी वनक्षेत्र के विभिन्न पहाड़ियों से पत्थरों का अवैध उत्खनन धड़ल्ले से हाे रहा है़ पत्थर का कारोबार करने वाले माफिया क्षेत्र से पत्थरों का अवैध उत्खनन कर ठेकेदारों को बेच रहे हैं. सादीपुर महावीरजी आश्रम समीप पहाड़, बांसकुली पहाड़ी व चड़कापाथर आदि पहाड़ों से पत्थरों का उत्खनन अवैध तरीके से किया जा रहा है. वहीं वनपाल वीरेंद्र सिंह ने कहा कि पत्थर उत्खनन के बारे में जानकारी नहीं है. मामले को गंभीरता से लेकर इसकी जांच के बाद कार्रवाई की जायेगी.
प्रति ट्रैक्टर पांच से नौ तक का फायदा
पत्थर कारोबारी पहाड़ी क्षेत्र से पत्थर का उत्खनन कर उसे ठेकेदारों को बेच देते हैं. ठेकेदार प्रति ट्रैक्टर पत्थर की कीमत 11 सौ से 15 सौ रुपये चुकाते हैं. वहीं खदान से खरीदने पर उसे 16 सौ से दो हजार रुपये प्रति ट्रैक्टर देना पड़ता है. मतलब सीधे ठेकेदार को प्रति ट्रैक्टर पांच रुपये से नौ सौ रुपये तक का फायदा पहुंचता है. यहीं कारण है कि व्यवसायी पत्थर को स्थानीय स्तर पर खरीदने की ज्यादा प्राथमिकता देते हैं. इससे पत्थर कारोबारियों तथा स्थानीय ठेकेदारों दोनों को ही सीधा लाभ पहुंचता है़ जबकि पत्थर कारोबारियों को किसी प्रकार का टैक्स भी नहीं देना पड़ता है.
स्थानीय स्तर पर खरीदारी को देते हैं महत्व
ठेकेदारों को खदान से पत्थर खरीदने के लिए या तो उसे बंगाल के पचामी जाना होगा या फिर उसे शिकारीपाड़ा खदान से पत्थर खरीदना पड़ेगा़
दूरी अधिक होने के कारण एक ओर जहां पत्थर की ढुलाई का खर्च बढ़ जाता है वहीं खदान से खरीदने पर ज्यादा पैसे भी चुकाने पड़ते हैं. जिससे बचना ठेकेदार की मजबूरी हो जाती है. अत: स्थानीय स्तर पर पत्थर कारोबारियों से ही पत्थर खरीदना मुनासिब समझते हैं. जिसके कारण् दिन प्रति दिन कारोबार दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रहा है और माफिया की गोटी लाल हो रही है.
पुल, पुलिया, गार्डवाल व क्रेटिंग में खपता है पत्थर, मिलते हैं अच्छे दाम
जानकारी के अनुसार पत्थर का धंधा करने वालों से स्थानीय पुलिस व वन विभाग की मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता. दिन में उजाले में जिस तरह से सड़कों पर बेरोक-टोक पत्थरों को ढोया जा रहा है और उस पर किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं होना विभाग व पुलिस की विफलता को दर्शाता है. यहीं कारण है कि स्थानीय ठेकेदार पुल पुलिया निर्माण, गार्डवाल निर्माण आदि कार्य के लिए स्थानीय स्तर पर कम कीमत पर पत्थर खरीदने को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं. क्योंकि यहां लाखों रुपये बिना टैक्स चुकाये समेट लेते हैं.
आश्रम पहाड़ी नहीं बन सका पर्यटन स्थल
रानीबहाल वनक्षेत्र के सादीपुर महावीरजी आश्रम के पहाड़ी को विभाग ने पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की बात कही थी. मगर किसी कारणवश पर्यटन स्थल विकसित करने का काम शुरू नहीं हो सका और अब पहाड़ी क्षेत्र से पत्थर का उत्खनन किये जाने से जहां औषधि पौधों को नुकसान पहुंच रहा है. वहीं मिट्टी क्षय होने से पर्यावरण की समस्या के साथ ही साथ पहाड़ के अस्तित्व पर संशय भी उत्पन्न हो गया है.
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