बदलते दौर में गुरु-शिष्य परंपरा बचाना चुनौती

Updated at : 05 Sep 2017 5:40 AM (IST)
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बदलते दौर में गुरु-शिष्य परंपरा बचाना चुनौती

प्रभात गोष्ठी . शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर प्रभात खबर पहुंचे गुरुजन, शिक्षा की चुनौतियाें पर हुई चर्चा, कहा दुमका : शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर प्रभात खबर दुमका कार्यालय में परिचर्चा का आयोजन किया गया. जिसका विषय शिक्षा की वर्तमान दशा व चुनौतियां था. इस विषय पर उच्च, माध्यमिक शिक्षा और प्रारंभिक […]

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प्रभात गोष्ठी . शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर प्रभात खबर पहुंचे गुरुजन, शिक्षा की चुनौतियाें पर हुई चर्चा, कहा

दुमका : शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर प्रभात खबर दुमका कार्यालय में परिचर्चा का आयोजन किया गया. जिसका विषय शिक्षा की वर्तमान दशा व चुनौतियां था. इस विषय पर उच्च, माध्यमिक शिक्षा और प्रारंभिक शिक्षा से जुड़े शिक्षकों ने अपनी-अपनी बेबाक राय रखी. कुछ ने माना कि शिक्षा का स्वरूप बदल रहा है, परिदृश्य बदल रहा है
और इसमें साकारात्मक बदलाव की किरणें प्रस्फुटित हो रही हैं. कुछ ने माना कि शिक्षकों का सम्मान कम हुआ है, इसकी वजह शिक्षक तथा वर्तमान शैक्षणिक व्यवस्था है. शासन-सत्ता के हस्तक्षेप और उसके द्वारा इसमें थोपे जाने वाली नीतियों से भी ऐसी शैक्षणिक परिस्थितियां पैदा हुई हैं. कुछ शिक्षकों ने माना कि आज शिक्षक समाज को भी आत्मचिंतन करने की जरुरत है,
ताकि देश फिर से विश्वगुरु कहलाने की स्थिति में पहुंचे. परिचर्चा में झारखंड अधिविद्य परिषद के सदस्य सह जिला स्कूल के प्राचार्य अजय कुमार गुप्ता, अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी श्याम किशोर सिंह गांधी, एसकेएम विश्वविद्यालय के लॉ काे-ऑर्डिनेटर डॉ अजय सिन्हा, डॉ हनीफ, डॉ रंजीत कुमार सिंह, अच्युत चेतन, डॉ राजेश कुमार, राष्ट्रपति पुरस्कार से पुरस्कृत दिलीप कुमार झा एवं चंदा कुमारी ने भाग लिया.
अहमियत और बढ़ेगी, जब गुरु बन कर रहेंगे
आज शिक्षा के उद्देश्य में ही भटकाव देखने को मिल रहा है. लाखों की पुस्तकें हैं लाइब्रेरी में, पर कर्मी नहीं. भवन बने हैं, पर क्लासरूम नहीं. इस तरह की नीति से शिक्षा का तारतम्य नहीं बन सकता. बच्चे आज डिग्री लेकर निकल रहे हैं, लेकिन उसके अनुरूप उन्हें रोजगार नहीं मिल रहा. शिक्षकों की प्रतिष्ठा धूमिल होने की वजह यह भी है. अब तो कॉलेज में एमडीएम की स्थिति महसूस होने लगी है. समाज पैनी निगाह से देख रहा है. शिक्षण नौकरी नहीं, सेवा है. पलायनवादी सोच से बाहर निकलना होगा.
डॉ अजय सिन्हा, लॉ काे-ऑर्डिनेटर, एसकेएमयू
मेरा मानना है कि जिस शिक्षक ने छात्र होना छोड़ दिया, विषय में समझ बनाना छोड़ दिया, तो वह शिक्षक बने नहीं रह पायेगा. सच्चे अर्थों में छात्र बनेंगे, तभी शिक्षक बनेंगे. आज हम ऐसे समाज में जी रहे हैं, जिसे हमलोग सत्ता की नजर से देखते हैं. जिसके द्वारा शिक्षक की मूल शक्ति को आज कमजोर कर दिया गया है. शिक्षक समाज ने अपने सम्मान के सबसे बड़ा हथियार को गिरवी रख दिया है. सत्ता के अनुसार हम पॉलिसी, सिलेबस, ज्ञान, विचार सब कुछ बदल देते हैं. छोटे कामों के लिए बड़ा समझौता कर लेते हैं.
प्रो अच्युत चेतन, व्याख्याता, पीजी अंग्रेजी विभाग
शिक्षा को लेकर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए, उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा और न ही इसमें सुधार के लिए साकारात्मक नीति ही बनायी गयी है. बच्चे शिक्षित तो हो रहे हैं, पर हम उन्हें बेहतर मानव संसाधन के रूप में विकसित नहीं कर पा रहे हैं. शिक्षक का अभाव प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा के स्तर तक है. प्राथमिक शिक्षक जो समर्पित हैं, अच्छा पढ़ाते हैं, उन्हें प्रतिनियुक्त कर दिया जाता है. शिक्षा का व्यवसायीकरण भी शिक्षकों के सम्मान को घटाने का बड़ा कारण है.
श्याम किशोर सिंह गांधी, राष्ट्रीय प्रवक्ता एआइपीटीए
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