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Dhanbad News: बच्चों की सांसों पर संकट, 26 दिनों में 17 गंभीर बच्चे रिम्स रेफर

Updated at : 30 Jan 2026 2:32 AM (IST)
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Dhanbad News: बच्चों की सांसों पर संकट, 26 दिनों में 17 गंभीर बच्चे रिम्स रेफर

एसएनएमएमसीएच के पीडियाट्रिक विभाग में मौजूद एकमात्र नियोनेटल वेंटिलेटर पिछले एक माह से खराब पड़ा है.

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शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (एसएनएमएमसीएच) के पीडियाट्रिक विभाग में मौजूद एकमात्र नियोनेटल वेंटिलेटर पिछले एक माह से खराब पड़ा है. इसका सीधा असर गंभीर रूप से बीमार नवजात और छोटे बच्चों के इलाज पर पड़ रहा है. हालात इतने गंभीर हैं कि एक से 27 जनवरी के बीच 17 गंभीर बच्चों को रिम्स, रांची रेफर करना पड़ा, क्योंकि धनबाद जिले के किसी भी सरकारी अस्पताल में फिलहाल बच्चों के लिए नियोनेटल वेंटिलेटर की सुविधा उपलब्ध नहीं है. कई मामलों में बच्चों की स्थिति इतनी नाजुक थी कि परिजनों के पास रांची ले जाने तक का समय नहीं था. मजबूरी में उन्हें निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ा, जहां इलाज का खर्च उनके लिए भारी साबित हुआ. निजी अस्पतालों में नियोनेटल वेंटिलेटर पर इलाज का खर्च प्रतिदिन लगभग 10 हजार रुपये तक आता है.एसएनएमएमसीएच न केवल धनबाद, बल्कि बोकारो, गिरिडीह, जामताड़ा सहित आसपास के जिलों के लिए प्रमुख सरकारी रेफरल सेंटर है. ऐसे में यहां पीडियाट्रिक विभाग की जीवन रक्षक सुविधा का ठप होना बच्चों की जान से जुड़ा गंभीर मामला बन गया है. डॉक्टरों के अनुसार, नियोनेटल वेंटिलेटर के बिना गंभीर नवजात मामलों में इलाज की संभावनाएं बेहद सीमित हो जाती हैं. पीडियाट्रिक विभाग के चिकित्सकों का कहना है कि मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन संसाधन बेहद सीमित हैं. एक वरिष्ठ चिकित्सक ने बताया कि हर सप्ताह औसतन दो से तीन नवजात ऐसे आते हैं, जिन्हें तत्काल वेंटिलेटर की जरूरत होती है, लेकिन मशीन खराब होने के कारण चाहकर भी बेहतर इलाज संभव नहीं हो पाता.

अब तक क्यों नहीं हुई मरम्मत

शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के अधीक्षक डॉ डीके गिंदौरिया के अनुसार, वेंटिलेटर काफी पुरानी हो चुकी है. इसे 14 साल पहले खरीदा गया था. स्थिति यह है कि अब इसके खराब हुए पार्ट्स भी नहीं मिल रहे. अब इसकी मरम्मत में काफी समस्या आ रही है.

गंभीर सवाल

इतने वर्षों में न तो वेंटिलेटर की संख्या बढ़ायी गयी और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था की गयी. पिछले 14 सालों में करीब छह अधीक्षक आये, पर वेंटिलेटर की संख्या नहीं बढ़ पायी.

जानिए, क्यों जरूरी है नियोनेटल वेंटिलेटर

नवजात शिशुओं में जन्म के तुरंत बाद सांस न ले पाना, निमोनिया, सेप्सिस और गंभीर श्वसन संक्रमण जैसी स्थितियों में वेंटिलेटर अनिवार्य होता है. नियोनेटल वेंटिलेटर नवजात और छोटे बच्चों की गंभीर सांस संबंधी समस्याओं में इस्तेमाल होने वाला जीवन रक्षक उपकरण है. यह उन शिशुओं को कृत्रिम रूप से सांस लेने में मदद करता है, जिनके फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं होते या जो जन्म के समय गंभीर संक्रमण से पीड़ित होते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर वेंटिलेटर की सुविधा मिलने से नवजात मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लायी जा सकती है.

अधीक्षक डॉ डीके गिंदौरिया से सीधा सवाल

प्रश्न: वेंटिलेटर कब से खराब है?

उत्तर: मशीन काफी पुरानी है और लगभग एक माह से खराब पड़ी है.प्रश्न: मरम्मत में देरी क्यों?

उत्तर: मशीन करीब 14 साल पुरानी है, इसके पार्ट्स मिलना मुश्किल हो रहा है.प्रश्न: कोई वैकल्पिक व्यवस्था?

उत्तर: फिलहाल कोई ठोस वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है, लेकिन इस पर विचार किया जा रहा है.प्रश्न: नया वेंटिलेटर कब मिलेगा?

उत्तर: नये वेंटिलेटर की मांग उच्च स्तर पर भेजी गयी है, प्रक्रिया में समय लगेगा.प्रश्न: अनुमानित लागत?

उत्तर : एक नियोनेटल वेंटिलेटर की लागत लगभग 18–20 लाख रुपये है.

कर्ज लेकर बच्चों का इलाज करा रहे

निजी अस्पतालों में बच्चों के इलाज का खर्चा इतना अधिक है कि आम लोगों के लिए पैसे की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती है. कई निजी अस्पतालों में एक दिन का खर्च 10 हजार रुपये तक पहुंच जाता है. ऐसी स्थिति में लंबे इलाज में यह राशि लाखों रुपये तक पहुंच जाती है. कई परिवार कर्ज लेने, गहने गिरवी रखने या संपत्ति बेचने को मजबूर हो रहे हैं. कुछ मामलों में आर्थिक तंगी के कारण समय पर इलाज नहीं हो पाने से बच्चों की हालत और बिगड़ भी गयी.

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ASHOK KUMAR

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By ASHOK KUMAR

ASHOK KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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