धनबाद : पुलिस पहरे में डाला गया 19.90 करोड़ का टेंडर

Updated at : 06 Feb 2019 7:31 AM (IST)
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धनबाद :  पुलिस पहरे में डाला गया 19.90 करोड़ का टेंडर

धनबाद : नगर निगम में मंगलवार को पुलिस के पहरे के बीच 19.90 करोड़ का टेंडर डाला गया. एनआइटी 85 के 103 ग्रुप के लिए रोड, नाली व सामुदायिक भवन का टेंडर पड़ा. नगर निगम में धांधली व टेंडर मैनेज करना कोई नयी बात नहीं है. नगर निगम बोर्ड के गठन के बाद से यह […]

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धनबाद : नगर निगम में मंगलवार को पुलिस के पहरे के बीच 19.90 करोड़ का टेंडर डाला गया. एनआइटी 85 के 103 ग्रुप के लिए रोड, नाली व सामुदायिक भवन का टेंडर पड़ा. नगर निगम में धांधली व टेंडर मैनेज करना कोई नयी बात नहीं है. नगर निगम बोर्ड के गठन के बाद से यह सिलसिला चल रहा है.

लेकिन अब टेंडर मैनेज नहीं बल्कि टेंडर नहीं डालने के लिए छोटे ठेकेदारों को धमकी दी जा रही है. इस तरह की शिकायत को देखते हुए नगर निगम प्रशासन ने नयी पहल शुरू की. नगर निगम कार्यालय के अलावा माडा कार्यालय व सदर थाना में टेंडर पेटी रखी गयी. नगर निगम कार्यालय परिसर में खुद नगर आयुक्त ने मोर्चा संभाल रखा था. परिसर के अंदर पुलिस थी लेकिन गेट के बाहर ठेकेदार टेंडर मैनेज करने में लगे रहे. सुबह दस से अपराह्न तीन बजे तक टेंडर डाला गया.

…क्यों आये हो, टेंडर डालना है तब जाओ
नगर निगम कार्यालय में इंट्री करना आज टेढ़ी खीर थी. गेट पर पहले पुलिस पूछताछ करते थे. अंदर अाने पर नगर आयुक्त का सामना करना पड़ता था. पूछा जाता था क्यों आये हो, टेंडर डालना है. अगर हां में जवाब मिला तो आगे जाने के लिए अनुमति दी जाती थी. टेंडर के कारण आज टैक्स कलेक्शन भी प्रभावित रहा.
टेंडर डालब… जाना तार हम केकर आदमी बानी
टेंडर डालने के क्रम में कोई हंगामा तो नहीं हुआ लेकिन थोड़ी बहुत धमकी जरूर दी गयी. कुछ नये ठेकेदारों को सुनाया गया. टेंडर डलब, जानतर हम केकर आदमी बानी. ऐसे ठेकेदार नगर निगम कार्यालय के अलावा माडा व सदर थाना के बाहर भी फिल्डिंग सजा रखे थे. एनआइटी 85 का ऑन लाइन टेंडर था. लिहाजा आज सिर्फ हार्ड कॉपी ही बॉक्स में डालना था. छोटे संवेदक बात को अनसुनी कर बॉक्स में टेंडर डालने से नहीं चुके.
पार्षद ने लगाया आरोप : पारदर्शिता ठीक है, कमीशन प्रथा भी खत्म करें अधिकारी
वार्ड नंबर 37 के पार्षद शैलेंद्र सिंह व वार्ड नंबर 10 के पार्षद देवाशीष पासवान ने नगर निगम प्रशासन पर आरोप लगाया है कि पारदर्शिता तो ठीक है. कमीशन प्रथा भी खत्म होना चाहिए. 22 प्रतिशत तक संवेदकों को कमीशन देना पड़ता है. ऐसे में काम की गुणवत्ता क्या होगी, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है.
एक तरफ अधिकारी कमीशन लेते हैं और दूसरी तरफ योजना की जांच भी करते हैं. जांच में कुछ न कुछ कमी बताकर फिर संवेदक से मोटी रकम मांगी जाती है. आखिरकार ठेकेदार कहां से पैसा देगा. निश्चित रूप से लो क्वालिटी का काम करेगा.
आज टेंडर डाला गया. सीएस में साढ़े तीन प्रतिशत कमीशन संवेदक को पहले भुगतान करना पड़ेगा. एमबी बुक भरने से लेकर बिल पेमेंट तक 15 से 18 प्रतिशत कमीशन देना पड़ता है. आठ प्रतिशत तक इंजीनियरिंग सेल व शेष निगम के अधिकारियों को कमीशन देना पड़ता है. कमीशन प्रथा बंद होगी तो निश्चित रूप से काम की क्वालिटी सुधरेगी और विकास नजर आयेगा.
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