Deoghar news :1832 से हो रही है हनुमान जी की पूजा, 100 युवा अखाड़ा में सीख रहे हैं कुश्ती के गुर

Published by : Sanjeev Mishra Updated At : 04 Apr 2025 7:37 PM

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रामनवमी के अवसर पर शहर के हनुमान मंदिरों के अलावा विभिन्न अखाड़ों में विशेष पूजा होगी. वहीं सुंदरकांड और सामूहिक रूप से लोग हनुमान चालीसा का पाठ भी करेंगे.

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संवाददाता, देवघर . रविवार को रामनवमी के अवसर पर शहर के हनुमान मंदिरों के अलावा विभिन्न अखाड़ों में विशेष पूजा का आयोजन किया जायेगा. शिवगंगा तट पर स्थित शांति अखाड़ा में यहां के उस्ताद सुभाष दत्त द्वारी की अगुवाई में हनुमान जी की विशेष पूजा का आयोजन होगा. श्रीद्वारी ने बताया कि इस अखाड़ा की स्थापना सन 1832 में हुई थी. उस दौर में विशेष पूजा व रामनवमी का उत्सव भव्य तरीके से होता था. लेकिन यहां चली आ रही परंपरा के अनुसार ही पूजा का आयोजन होता है. चैत माह के बुढ़वा मंगल में जिस दिन नगर गंवाली पूजा का आयोजन हुआ. उस दिन बुढ़वा मंगल का ही दिन था. परंपरा के अनुसार इस दिन हनुमान जन्मोत्सव को धूमधाम से मनाये जाने की परंपरा रही है, जिसमें विशेष पूजा के साथ जुलूस निकाला जाता था. भगवान राम के हनुमान का अराध्य होने के कारण इस दिन को विशेष तौर पर मनाया जाता है. इस दिन यहां पर सुबह आठ बजे हनुमान जी की आचार्य व पुरोहित गुलाब पंडित विशेष पूजा करेंगे. सामूहिक रूप से सुंदरकांड व हनुमान चालीसा का पाठ किया जायेगा. शाम को सोनू मठपति की ओर से हनुमान जी का भव्य शृंगार व आरती की जायेगी. यहां पर वर्तमान में करीब 100 युवा श्रीद्वारी से अखाड़ा में कुश्ती के गुर सीख रहे हैं. विशेष पूजा के बाद कुंवारी पूजा, भोजन व शाम में प्रसाद का वितरण किया जायेगा. बताया कि अखाड़ा में पहलवानों द्वारा उपयोग किये जाने वाले सभी यंत्रों की भी पूजा की जायेगी. वहीं कुश्ती स्थल पर पहलवान लाठी भांज कर करतब दिखायेंगे. मिली जानकारी के अनुसार पूर्व से चली आ रही परंपरा के अनुसार किसी भी तरह के जुलूस का आयोजन नहीं होगा. लोग आराम से दोपहर बाद हनुमान जी का दर्शन कर सकते हैं. पूजा व अन्य कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए जवाहर दत्त द्वारी, साहिल दत्त द्वारी, प्रकाश मिश्र, बालाजी कर्म्हे ,भैरो बाबा, समीर कर्म्हे, लबो परिहस्त, अप्पू नरौने आदि दर्जनों युवा लगे हैं. ॰शांति अखाड़ा में यहां के उस्ताद सुभाष दत्त द्वारी की अगुवाई में होती है पूजा ॰1832 में हुई थी अखाड़ा की स्थापना ॰अखाड़े से जुलूस नहीं निकालने की रही है परंपरा

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