त्रिकालदर्शी देव प्राणियों पर सदैव रखते हैं समदर्शी भाव, उपनिषदों में है शिव तत्व की महत्ता का वर्णन

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देवघर में लगा श्रावणी मेला.

Shravnai Mela 2025 Special: जो अचिंत्य है, अव्यक्त हैं और अनंत है. कल्याणमय है, प्रशांत है, अमृत है, जो ब्रह्म अर्थात निखिल ब्रह्मांड का मूल कारण बताया गया है. इसका आदि, मध्य और अंत नहीं है, तभी तो उन्हें अनंत की संज्ञा दी गयी है. उपनिषदों में कहा गया है कि शिव चिदानंद हैं, रूप रहित हैं. उमा सहित परमेश्वर की साधना से सर्वफल की प्राप्ति होती है. शिव की महिमा का गुणगान करते भक्त कतई अघाते नहीं हैं.

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Shravnai Mela 2025 Special: इहलोक हो या परलोक. त्रिकालदर्शी देव शिव हर जगह व्याप्त हैं. कण-कण में शिव तत्व की महत्ता का वर्णन है, जिसे साधारण नजरिये से नहीं देखा जा सकता. शिव तत्व पाने के लिए काया को शिवमय करना अनिवार्य है. ऋषियों, मुनियों, साधकों और महर्षियों का ऐसा मानना है. भारतीय वाङमय में उपनिषदों की महत्ता को बताया गया है, जो देवभाषा में लिखी गयी है. इसे पवित्र ग्रंथ की संज्ञा दी गयी है और आदिकाल से पौराणिक ग्रंथों में शिव तत्व का विषद वर्णन उपलब्ध होता है.

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मनीषियों एवं साधकों ने कठिन तप से जो कुछ भी हासिल किया था, उसे ही लिपिबद्ध करने का सार्थक प्रयास किया है. इसमें आस्था एवं संस्कृति का जिस प्रकार का चित्रण किया गया है, उससे स्पष्ट है कि आदि काल से पूजित देव देवाधिदेव महादेव वाकई में सर्वशक्तिमान देव हैं, जो निराकार और निर्विकार होते हुए भी लोक कल्याण करने में अग्रणी हैं. तभी तो अनादिकाल से पूजित होने वाले शिव आज भी जनमानस के बीच लोकप्रिय हैं.

पौराणिक ग्रंथों की मानें, तो संस्कृति एवं आस्था का विहंगम संगम मिला करता है. भारतीय मत मानते हैं कि सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद हैं. इसके बाद ही उपनिषदों व पुराणों का स्थान आता है. कैवल्योपनिषद में शिव तत्व के संदर्भ में वर्णन आया है-
उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्रिलोचनं नीलकंठम् प्रशांतम् ।
ध्यात्वा मुनिगच्छत भतयोनिं समस्त साक्षिं तमस: परस्तात्।।

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कहने का तात्पर्य है कि उमा सहित शिव परमेश्वर है, नीलकंठ हैं, त्रिलोचनधारी हैं और जो भी साधना करते हैं, उन्हें अंधकार से देवाधिदेव महादेव प्रकाश की ओर ले जाते हैं. शिव को ही सर्वदेव कहा गया है, जिसकी पूजा अर्चना-लोग करते आ रहे हैं.

जो अचिंत्य है, अव्यक्त हैं और अनंत है. कल्याणमय है, प्रशांत है, अमृत है, जो ब्रह्म अर्थात निखिल ब्रह्मांड का मूल कारण बताया गया है. इसका आदि, मध्य और अंत नहीं है, तभी तो उन्हें अनंत की संज्ञा दी गयी है. उपनिषदों में कहा गया है कि शिव चिदानंद हैं, रूप रहित हैं. उमा सहित परमेश्वर की साधना से सर्वफल की प्राप्ति होती है. शिव की महिमा का गुणगान करते भक्त कतई अघाते नहीं हैं.

स ब्रह्मा, स शिव: सेन्द्र: सो अक्षर: परम: स्वराट्।
स एव विष्णु: स प्राण: सह कालेग्नि स चंद्रमा ।।
सएव सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं सनातनम् ।।
ज्ञात्वा तं मृत्युंमत्येति नान्य: पंथा विमुक्तये ।।

अर्थात जो अचिंत्य है, अव्यक्त हैं और अनंत है. कल्याणमय है, प्रशांत है, अमृत है, जो ब्रह्म अर्थात निखिल ब्रह्मांड का मूल कारण बताया गया है. इसका आदि, मध्य और अंत नहीं है, तभी तो उन्हें अनंत की संज्ञा दी गयी है. उपनिषदों में कहा गया है कि शिव चिदानंद हैं, रूप रहित हैं. उमा सहित परमेश्वर की साधना से सर्वफल की प्राप्ति होती है. शिव की महिमा का गुणगान करते भक्त कतई अघाते नहीं हैं. भक्त सच्चे मन से अगर पूजा-अर्चना करते हैं, तो अविनाशी परमात्मा प्रसन्न होकर मोक्ष-सा फल प्रदान करते हैं. जो शिव की पूजा करते हैं, उनके घर में सदैव सर्वमंगल होते रहता है.

सुमंगलम् तस्य गृहे विराजते, शिवेति वर्णैर्मुवि यो हि भाषते।

आस्था को जो सैलाब वर्तमान समय में दर्शित होता है, उसके पीछे शिव तत्व की महत्ता ही है और शिव तत्व के ज्ञान से ही कल्याण की प्राप्ति होती है. शिव को रुद्र की संज्ञा दी गयी है, जो रुद्र इंद्रादि देवताओं की उत्पत्ति का हेतु और वृद्धि का कारण है, सबों के अधिपति कहे गये हैं. नारायणोपनिषद में शिव को – शिवाय नम:, शिवलिंगाय नम:,भवाय नम:, भवलिंगाय नम: आदि मंत्रों से पूजित करने का विधान बताया गया है.

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गर्भोपनिषद में कहा गया है कि भगवान महेश्वर यानी शिव गर्भस्थ जीवों के दुखों का भी निवारण करते हैं, तभी तो इसकी पूजा अर्चना नर-नारी अबाध गति से करते हैं. एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थु… वेद की ऋचाओं में त्र्यम्बक के नाम से उच्चरित किया गया है. शिव स्त्री व पुरुष दोनों स्वरूप में विराजमान हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि शिव तत्व की महिमा का पौराणिक ग्रंथों में विस्तार से उल्लेख है और आज भी प्रवाहमान है. उपनिषद वेद का ही अंग होने के चलते इसे वेदांग भी कहा जाता है.

सदियों से पूजन की परंपरा लोक में चली आ रही है. शिव के स्वरूप को देखें, तो कोई भी बाह्याडंबर नहीं है. शिव श्मशान में रहने वाले भूत-बैताल के साथ भी हैं और साधना में अपने को न्योछावर कर देने वाले भक्तों के साथ हैं. जगत में कोई भी प्राणी इनकी ऊर्जा के बगैर सजीव नहीं रह सकता है. ऋग्वेद में कहा गया है –
स्वस्ति नो रुद्र: पात्वंहस: गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षती ।

शिव-पार्वती की महिमा का वर्णन सभी प्राचीन धर्मग्रंथों में किसी न किसी रूप में आया है, लेकिन उपनिषदों में जिस प्रकार से विस्तार से बताया गया है, वह जीवन के लिए बहुत ही लाभप्रद है.

भस्मधारी शिव भी एक नाम आया है. अपने तन पर भस्म लगाते हैं, जो संदेश देता है कि हर मानव सादगी से जीयें और मानव हितार्थ कार्य करें. गले में सांपों को लपेटे रहते हैं, यह संदेश देता है कि हर जीव के प्रति सहानुभूति रखें, सादा जीवन उच्च विचार का मूलमंत्र शिव तत्व में समाहित है. सत्यमेव जयते मुंडकोपनिषद से लिया गया प्रसिद्ध वाक्य है. कहा जाता है कि सत्य की ही हमेशा जीत होती है. सत्य बोलने का ही संदेश शिव तत्व का मुख्य संदेश है.

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