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Chaibasa News : डॉ रामदयाल मुंडा का जीवन समाज सुधार व अधिकारों की लड़ाई को समर्पित रहा : डॉ मीनाक्षी

Updated at : 23 Aug 2025 11:25 PM (IST)
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Chaibasa News : डॉ रामदयाल मुंडा का जीवन समाज सुधार व अधिकारों की लड़ाई को समर्पित रहा : डॉ मीनाक्षी

कोल्हान विश्वविद्यालय के टीआरएल विभाग में शनिवार को पद्मश्री रामदयाल मुंडा की 86वीं जयंती पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया.

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चाईबासा.

कोल्हान विश्वविद्यालय के टीआरएल विभाग में शनिवार को पद्मश्री रामदयाल मुंडा की 86वीं जयंती पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन से हुई. कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मानव शास्त्र विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ. मीनाक्षी मुंडा ने कहा कि रामदयाल मुंडा आदिवासी समाज के समाज-सुधारक, प्रख्यात मानवशास्त्री और भाषाविद थे. उन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासी समाज के उत्थान और सशक्तीकरण के लिए समर्पित किया. संगोष्ठी में वक्ताओं ने डॉ. मुंडा के जीवन और कार्यों पर प्रकाश डाला. बताया गया कि उन्होंने आदिवासी भाषाओं, लोक-संस्कृति और जीवन-दर्शन को समृद्ध कर गौरवशाली पहचान दिलायी. एक समाज-नेता के रूप में उन्होंने आदिवासी अस्मिता, संस्कृति और अधिकारों को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आवाज़ दी. झारखंड राज्य निर्माण आंदोलन में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही. उन्होंने विभिन्न आदिवासी समूहों को एकजुट कर उन्हें राजनीतिक पहचान दिलायी.

कार्यक्रम में रहे शामिल

सोशल साइंस के डीन, हो समाज महासभा के केंद्रीय अध्यक्ष, संताली विभाग के प्रो. बसंत चाकी, कुरमाली विभाग के सहायक प्रो. सुभाष चंद्र महतो, गणित विभाग के सहायक प्रो. महेंद्र राणा, दर्शनशास्त्र विभाग की डॉ. प्रीति और डॉ. शीथ टोप्पो, होम साइंस व भूगोल विभाग की डॉ. कंचन कच्छप, टाटा कॉलेज की डॉ. विनिता कच्छप, संताली विभाग के सहायक प्रो. निसोन, मानव शास्त्र विभाग के शिक्षक भोलेनाथ पान, देबोस्मिता गिरी सहित अनेक छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे.

डॉ. रामदयाल मुंडा का जीवन परिचय

डॉ. मुंडा (1939-2011) केवल एक मानवशास्त्री और भाषाविद् ही नहीं, बल्कि लोकनायक भी थे. उन्होंने आदिवासी गीत-संगीत, भाषाओं और परंपराओं को जीवित रखा और उन्हें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया. सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने झारखंड राज्य निर्माण आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभायी. उन्होंने आदिवासी अस्मिता और अधिकारों की आवाज को संयुक्त राष्ट्र संघ तक पहुंचाया. संगोष्ठी में इस बात पर भी चर्चा हुई कि आज की पीढ़ी किस प्रकार डॉ. मुंडा की विचारधारा से प्रेरणा लेकर उनकी विरासत को आगे बढ़ा सकती है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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