Chaibasa News : परंपरा को जीवित रखने का प्रतीक है षिरजोन महोत्सव : सोनाराम

Published by : ATUL PATHAK Updated At : 09 Nov 2025 11:20 PM

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षिरजोन 5.0 जनजातीय खेल महोत्सव परंपरा, खेल और संस्कृति को एक सूत्र में पिरोया

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नोवामुंडी प्रखंड के बड़ाबालजोड़़ी गांव में आयोजित षिरजोन 5.0 जनजातीय खेल महोत्सव के अंतिम दिन अद्भुत उत्साह और सांस्कृतिक रंगों से भरपूर रहा. चार दिवसीय इस आयोजन ने जनजातीय समाज की परंपरा, खेल और संस्कृति को एक सूत्र में पिरोने का काम किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जगन्नाथपुर के विधायक सोनाराम सिंकु ने फुटबॉल में किक मारकर मैच का शुभारंभ किया.

एलकेएम ब्रदर्स जमशेदपुर ने एसडीएम-11 नोवामुंडी को हराया

फाइनल मुकाबला एलकेएम ब्रदर्स, जमशेदपुर और एसडीएम-11 नोवामुंडी के बीच खेला गया. मुकाबला काफी रोमांचक रहा. रोमांचक खेल के बाद एलकेएम ब्रदर्स जमशेदपुर विजेता बना. दर्शकों ने जोश के साथ खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाया.

अंतिम दिन पारंपरिक और आधुनिक खेलों का आयोजन

फुटबॉल, सेकॉर, चुर, पीटू, किरी गलंड, जॉनोह गलंड, आदिविक्की बई, चादु टिपिल, बाबा रुड़, दौड़ बदाबदि, फुट आरोड़ बदाबदि, बनम गोड़ बदाबदि, गुरुपुडु सिंगेल, टेऊ सिंगेल, और बोड़ पटाः जैसे जनजातीय खेलों का आयोजन किया गया. साथ ही सांस्कृतिक झांकी, पारंपरिक सुसुन तथा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम ने जनजातीय परंपरा, नृत्य और गीतों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. कार्यक्रम में समाज के विभिन्न वर्गों जैसे जनजातीय साहित्यकारों, लेखकों, जनप्रतिनिधियों, मुंडा-मानकियों और समाजसेवियों को मंच पर सम्मानित किया गया.

कार्यक्रम को सफल बनाने में इनका मुख्य योगदान रहा

इंटक जिला अध्यक्ष चंद्रशेखर दास, जगन्नाथपुर प्रखंड अध्यक्ष ललित कुमार दोराईबुरु, नोवामुंडी प्रखंड उपाध्यक्ष सह पेटेता मुखिया जेना पुरती, प्रखंड उपाध्यक्ष सुरज चांपिया, मुंडा सोमनाथ सिंकु, महासचिव रूप सिंह लागुरी, कांग्रेस महासचिव रंजीत गागराई, रोशन दास, दानिश हुसैन, मामूर कासमी, बुधराम चातोंबा, सुशील हेस्सा, मथुरा, राम गोप, मोरान सिंह कराई, आलोक पांडेय.

महोत्सव को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी : सिंकु

मौके पर विधायक सोनाराम सिंकु ने कहा कि आदिवासी समाज की असली पहचान हमारी संस्कृति, भाषा, नृत्य, गीत है. यह खेल महोत्सव केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी परंपरा को जीवित रखने का प्रतीक है. हमारे समाज के वैसे लोग जो शिक्षा या रोजगार के लिए राज्य से बाहर हैं, उन्हें भी ऐसे आयोजनों में अवश्य भाग लेना चाहिए, ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहें. आदिवासी समाज की भाषा, नृत्य, गीत, संस्कृति और रीति-रिवाज हमारी पहचान है. इसे बचाना और आगे बढ़ाना हम सबकी जिम्मेदारी है. कार्यक्रम के समापन पर पूरा मैदान जनजातीय गीतों, मांदर की थाप और पारंपरिक नृत्य से गूंज उठा. बड़ाबालजोड़़ी गांव ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि कोल्हान की मिट्टी में संस्कृति, एकता और परंपरा की गहरी जड़ें आज भी जीवित हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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