Chaibasa News : जलियांवाला की तरह थी डोम्बारी बुरु की घटना

Published by : ATUL PATHAK Updated At : 09 Jan 2026 11:57 PM

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चक्रधरपुर. झारखंड के खूंटी जिले में स्थित ऐतिहासिक डोम्बारी बुरु पहाड़ी पर शुक्रवार को 126वां शहादत दिवस मनाया गया. इस अवसर पर हजारों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग एकत्र होकर उन शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने 9 जनवरी 1900 को जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए ब्रिटिश हुकूमत की गोलियों के सामने अपने प्राण न्योछावर कर दिये थे. डोम्बारी बुरु वह ऐतिहासिक स्थल है, जहां धरती आबा बिरसा मुंडा के नेतृत्व में चल रहे उलगुलान (महान विद्रोह) के दौरान ब्रिटिश सेना ने निहत्थे आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलीबारी की थी. इस नरसंहार में सैकड़ों, बल्कि लोककथाओं और समकालीन विवरणों के अनुसार हजारों आदिवासी पुरुष, महिलाएं और बच्चे शहीद हुए थे. कहा जाता है कि पहाड़ी ही नहीं, पास बहने वाली ताजना नदी की सहायक धारा तक शहीदों के रक्त से लाल हो गयी थी. शहादत दिवस के मौके पर वक्ताओं ने कहा कि डोम्बारी बुरु का नरसंहार क्रूरता में जलियांवाला बाग से भी कम नहीं था. पर इसे आज तक इतिहास की मुख्यधारा में वह स्थान नहीं मिला, जिसका यह हकदार है. ब्रिटिश अभिलेखों में मौतों की संख्या को बहुत कम दर्शाया गया, जबकि 1957 की बिहार सरकार की रिपोर्ट में भी सैकड़ों आदिवासियों के मारे जाने का अनुमान लगाया गया है. स्थानीय स्मारक पर दर्ज शहीदों के नामों में हाथीराम मुंडा, सिंगराई मुंडा, हाड़ी मुंडा, मझिया मुंडा सहित कई वीरांगनाओं का स्मरण करते हुए वक्ताओं की आंखें नम हो गईं. आज भी बड़ी संख्या में शहीद गुमनाम हैं, जिनका बलिदान पूरे आदिवासी समाज की सामूहिक स्मृति में जीवित है.

आज भी जंगल, जंगल व जमीन के लिए संघर्ष कर रहा आदिवासी समाज

इस अवसर पर आदिवासी युवा मित्र मंडल चक्रधरपुर के सचिव रवींद्र गिलुवा ने कहा कि डोम्बारी बुरु केवल अतीत की घटना नहीं, बल्कि संघर्षों का प्रतीक है. उन्होंने कहा कि आदिवासियों ने स्वतंत्रता की सबसे बड़ी कीमत चुकाई है. आज भी हमारा समाज अपने अधिकार, जमीन और जंगल की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है. डोम्बारी बुरु हमें यह याद दिलाता है कि शहादत की यह गाथा कभी भुलाई नहीं जा सकती. कार्यक्रम के दौरान 110 फीट ऊंचे शहीद स्तंभ पर माल्यार्पण किया गया. धरती आबा बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित कर श्रद्धांजलि दी गयी. पारंपरिक गीत-संगीत और सामूहिक प्रार्थनाओं के बीच शहीदों को नमन किया गया.

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