Chaibasa News : हंसाबेड़ा में 90 साल से लगातार लग रहा इंदमेला

Published by : AKASH Updated At : 26 Oct 2025 10:55 PM

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आदिवासी सभ्यता, संस्कृति व भाषा का लोक त्योहार, प्रकृति पूजा, जतरा व इंदमेला के बिना अधूरा है.

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आनंदपुर.

आदिवासी सभ्यता, संस्कृति व भाषा का लोक त्योहार, प्रकृति पूजा, जतरा व इंदमेला के बिना अधूरा है. आधुनिकता की होड़ में आदिवासी रुढ़िवादी प्रथा में कमी आयी है, पर हारता पंचायत के हंसाबेड़ा का इंदमेला 90 वर्षों से लगातार होता चला आ रहा है. 1936 से आयोजित यह मेला कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. मानसून पर निर्भर रहने वाले क्षेत्र के ग्रामीण धान की फसल पक जाने पर बारिश के देवता इंद्रदेव का परंपरागत तरीके से आभार जताते हैं. उनके सम्मान में एक साल लकड़ी के तना को पूरे विधि, विधान के साथ इंदटांड़ (कार्यक्रम स्थल) के सिंहासन पर विराजमान कराते हैं. इस दौरान साल के खूंटा पर लाल रंग के मलमल का कपड़ा, सिंहासन और सफेद कपड़ा लगाया जाता है. आदिवासी जाति, आदिवासी जनजाति व अन्य समुदाय के पाहन, पुजारी, दिउरी, मांझी व प्रमुख विधि-विधान से पूजा कराते हैं. गांव के लोगों को आरोग्य करने और पशुधन की रक्षा करने के लिए विनती करते हैं.

ढोल और मांदर की थाप पर थिरकते हैं ग्रामीण

इंदखूंटा लगाने के दौरान ग्रामीण विधि-विधान का पालन करते हैं. साल के तना को पूजक मानकर उसे सम्मान देते हैं. जमीन पर गिरने से बचाते हैं. देर रात इंदटांड़ में पूजा अर्चना के बाद आदिवासी जाति, जनजाति, सरना समुदाय द्वारा ढोल व मांदर की थाप पर लहसुवा, जतरा, राटा, झूमर लोकगीत पर नृत्य करते हैं.

क्या कहते हैं जानकार

हारता पंचायत के काड़ेदा गांव के सेवानिवृत्त शिक्षक प्रेम दानियल भुइयां ने कहा कि आदिवासी समुदाय में करमा, सरहुल, सोहराय, मागे पर्व के अलावा इंदमेला और जतरा भी काफी महत्वपूर्ण है. इंदमेला और जतरा विभिन्न गांवों में सुविधा व तिथि के अनुसार आयोजित किया जाता है. आधुनिकता के इस दौर में इसपर प्रभाव पड़ा है. 1936 से हंसाबेड़ा में इंद मेला शुरू किया गया. 1950 से 1970 तक हारता पंचायत का हंसाबेड़ा इंदमेला पूरे शबाव पर था. हंसाबेड़ा इंदमेला की ख्याति चारों ओर थी. आसपास गांव के अलावा दूरदराज से ग्रामीण पहुंचते थे. विभिन्न समुदाय के नाच पर उन्हें पुरस्कृत किया जाता था.

पहले आनंदपुर में होता था इंदमेला

आनंदपुर में पहले इंदमेला और जतरा दोनों कार्यक्रम होता था. दुर्गापूजा दशमी की रात आसपास के कई गांव के ग्रामीणों की जतरा नाच टोली बाजार टांड़ पहुंचती थी और सुबह तक जतरा नाच होता था. इस आयोजन के बाद आसपास के गांव में जतरा इंदमेला शुरू होता था. पिछले नौ साल से यह आयोजन बंद हो गया. 2025 में नागपुरी उत्सव का शुभारंभ किया गया है.

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