-हरिवंश-
बाघी, पलामू का अंतिम गांव था. इसके बाद गढ़वा के फकीराडीह, जिबका, रून, परसो और मंडल गांवों में हम गये. बाघी में 125 घर हरिजन, 60-65 घर भुईया, 7 घर खैरवार और 30 घर बैठा है; लगभग छह घर साहू जी लोगों के हैं. बाघी में जलधारा के तहत बनाकुआं सूखने की स्थिति में पहुंच गया है. रामवतार राम (बाघी) ने बताया कि कल ही उसने लगभग 1500 रुपये कीमत का बछड़ा 600 रुपये में बेच दिया.
साहब, जान है, तो जहान है, जीप ड्राइवर टिप्पणी करते हैं. बिचका, गढ़वा का सबसे बड़ा गांव है. 19 सीट का गांव, एक सीट के तहत 500 एकड़ जमीन माना जाता है. पलामू-गढ़वा के खैरवारों की सबसे बड़ी बस्ती. पहाड़ों की गोद में बसा दरअसल किंवदंतियां बताती है. यह खैरवारों की पीठ थी यहां के पहाड़ों-गुफाओं से अनेक रहस्य रोमांच के किस्से जुड़े हैं. पलामू में अंगरेजों के खिलाफ विद्रोह की अगुवाई करने वाले नीलांबर-पीतांबर से इस धरती का रिश्ता है. इतिहास के अनेक प्रसंग दफन हैं. कुछ वाचिक परंपरा से लोक गीतों और किस्सों में जीवित है. पर दुखभरा वर्तमान समृद्ध अतीत से प्रेरित नहीं हुआ करता. इन सारे गांवों की व्यथा एक है, नाम भले ही अनेक हो . पानी के स्रोत आहर, पईन, नदी-नाले सूखते जा रहे हैं. अधिसंख्य मुखिया, बीडीओ इस अकाल को धनार्जन का ईश्वरप्रदत्त अवसर मानते हैं. ‘मत चूको चौहान’ वाली स्थित है.
डालटनगंज जिले के पोखरी खुर्द गांव (पंचायत सरायडीह) के छठू राम ने कहा कि जवाहर योजना के तहत 23 घर बनने थे. 1992 से ही उनमें काम लगा है, पर अभी भी अधूरा है. वह आरोप लगाते है कि इससे 20 लाख से अधिक का गोलमाल हुआ है. बीडीओ रामलखन रविदास और मुखिया, शेखनबीउल्ला के खिलाफ उनकी गंभीर शिकायत है. जवाहर रोजगार योजना के तहत सरायडीह पंचायत के हरहर गांव में वनारोपण के लिए 1.20 लाख रुपये मिले. लेकिन 20 पेड़ भी नहीं लगाये गये. संतोखी भुईया हरिजन के नाम पर कुआं स्वीकृत हुआ. मुखिया जी ने अपने यहां उसे बनवा लिया.
यह भी आरोप है कि हरिजनों के नाम पर गाय-भैंस लेकर दबंग लोग अपने-अपने घरों में बांध रहे हैं. इस भ्रष्टाचार के खिलाफ वहीं के एक युवक नंदकिशोर प्रजापति ने आत्मदाह की धमकी दी, तो पुलिस उसे ही पकड़ ले गयी. गंभीर आरोपों की जांच किसी स्तर पर नहीं हो रही है. व्यवस्था की इस मानवीय विफलता और ऐतिहासिक कारणों से पलामू (डालटनगंज-गढ़वा) में सूखे का प्रकोप लगातार गहराता रहा है. 1929 में भारतीय सिंचाई आयोग ने पलामू को ‘सबसे सूखा और राज्य का संभवतया सबसे गरीब जिला’ कहा था.
उन्हीं दिनों एक अंगरेज अफसर ने लिखा ‘पलामू देश के सबसे पिछड़े राज्य का सबसे पिछड़ा इलाका है. पिछले सौ वर्षों में छह अकाल, तीन भयावह बाढ़ और सात बार सूखे से प्रभावित हुआ.’ (संदर्भ बीसी बसु कृत रिपोर्ट आन द एग्रीकल्चर आफ द डिस्ट्रक्टि आफ लोहरदगा 1897. पृष्ठ 57-65). प्रमाणिक रिपोर्ट और प्रशासनिक दस्तावेज बताते हैं कि मानसून की विफलता के कारण ही अकाली पड़ते रहे हैं. सूखे का भीषण प्रकोप होता रहा है. पलामू का उत्तरी इलाका अपेक्षाकृत समतल है, यहां के लोग खरीफ-रबी पर निर्भर करते हैं. दक्षिणी हिस्सा पहाड़ी है. जहां भदई फसल ही अधिक होती है.
इस बार बरसात न होने से पहाड़ी गांवों में फसल लगभग नहीं हुई. आदिवासी, जंगली उत्पादों पर निर्भर करते है. पर उजड़ते वन और सरकार की वन नीति से वह अपने-अपने घरों में ही पराये बन गये हैं. 1868-69 के दुर्भिक्ष के प्रामाणिक सबूत मिलते है. इस दुर्भिक्ष के दौरान सड़क निर्माण, संचार साधनों के निर्माण और राहत पहुंचाने के लिए पलामू में एक मुकम्मल योजना बनी थी. उस दौर में सूखे से निबटने के लिए अंगरेजों ने इस अंचल पर लगभग साढ़े पांच करोड़ रुपये खर्च किये. आज वह साढ़े पांच करोड़, साढ़े पांच सौ करोड़ के आसपास होगा. 1873-74 में भी अकाल पड़ा. पर 1897 में पुन: दुर्भिक्ष आया.
शायद उस सदी का सबसे बड़ा दुर्भिक्ष, 1918,1920,1952-54,1957-58,1961-62 में भी सूखे और अकाल का प्रकोप रहा. 1868-69 और 1893-94 के अनुभवों के बाद आहर (पानी के छोटे-छोटे स्रोत) बनाने की मुकम्मल योजना अंगरेजों ने तैयार की. पलामू के पश्चिमी हिस्से में उन्होंने आहर बनवाये, जिससे बाद में उस अंचल को काफी लाभ मिला. अगर आजादी के बाद सिंचाई मद में पलामू में हुए 14-15 अरब का खर्च, सही सुनियोजित तरीके से हुआ होता, तो आज स्थिति भिन्न होती, पर 1967 के अनुभव के बाद भी व्यवस्था की आंखों नहीं खुलीं.
साथी गोकुल बसंत छेड़ते है कि 1967 के अकाल में एक सुखाड़ी भुईया की मौत के बाद पूरी राजनीति में कैसी गरमी पैदा हो गयी थी, जेपी कूद पड़े, बिहार सरकार पूरी ताकत से उतर गयी, केंद्र सरकार आ पहुंची, श्रीमती इंदिरा गांधी पहुंचीं और राष्ट्र के नाम संदेश में पलामू की पीड़ा को उजागर किया, स्वयंसेवी संस्थाएं और उद्योगपति के अनेक केंद्र देश-विदेश से वहां पहुंचे पर इस बार कितना कुछ कहे-लिखे जाने के बाद भी पलामू राज्य का मुद्दा नहीं बन पाया है.
राष्ट्र का मुद्दा बनना तो दूर की चीज है. सहयात्री इस बहस में डूब जाते है कि यह मुद्दा या ऐसे दूसरे मुद्दे अब क्यों लोगों को उद्वेलित नहीं करते. राज-समाज को नहीं मथते. यह सवाल महज पलामू-गढ़वा के सूखे से ही संबंधित नहीं है क्योंकि इसकी जड़ें कहीं और है. उद्योग के बाद अब मीडिया और राजनीति में कॉरपोरेट कल्चर (निगम संस्कृति) जड़े जमा रहा है. यह कॉरपोरेट पालिटिकल कल्चर (अंगरेजी नाम सोदेश्य इस्तेमाल किया गया है) क्या है, पलामू तक यह कैसे आ पहुंचा है? क्यों इसके तहत मानवीय मुद्दे अपना अर्थ-प्रासंगिता और करुणा खो चुके है? जिस तरह सूखा मुद्दा नहीं बन रहा है. उसी तरह हत्या, बलात्कार के कारुणिक प्रसंग भी अब मुद्दे नहीं बना करेंगे. क्योंकि कॉरपोरेट पालिटिकल कल्चर के तहत ऐसे मुद्दे आते ही नहीं. यह कल्चर है क्या. यह अगले रिपोर्ताज में.
06-03-1993

