हिंदी के आलोचक डॉ चंद्रेश्वर कर्ण का निधन

Updated at : 20 Jun 2014 5:23 AM (IST)
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हिंदी के आलोचक डॉ चंद्रेश्वर कर्ण का निधन

हजारीबाग : हिंदी के प्रख्यात आलोचक डॉ चंद्रेश्वर कर्ण का बुधवार रात करीब 10.30 बजे दिल्ली के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. वह पिछले एक माह से बीमार थे. दिल्ली में बेटी के घर रहते थे. रक्तचाप बढ़ जाने के कारण दिल्ली के निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. डॉ कर्ण […]

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हजारीबाग : हिंदी के प्रख्यात आलोचक डॉ चंद्रेश्वर कर्ण का बुधवार रात करीब 10.30 बजे दिल्ली के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. वह पिछले एक माह से बीमार थे. दिल्ली में बेटी के घर रहते थे. रक्तचाप बढ़ जाने के कारण दिल्ली के निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. डॉ कर्ण के परिवार में पत्नी और चार पुत्री हैं.

डॉ कर्ण ने मेदिनीनगर के लेरर के पद से अपने कैरियर की शुरुआत की थी.

हिंदी के आलोचक डॉ ..

उन्होंने 1975 में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की. इसके बाद 1983 में उनका तबादला हजारीबाग कर दिया गया. हजारीबाग से वह विनोबा भावे विश्वविद्यालय से हिंदी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए.

डॉ कर्ण की पहचान आलोचकों में थी. पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनकी भूमिका रही. हलधर पत्रिका, लोहिया स्मृति अंक के संपादक रहे. हिंदी नयी कहानी का स्वरूप और जीवन बोर्ड पर शोध किया. 1977 में पहली पुस्तक आंचलिक हिंदी कहानी, 1981 में उपान्यासकार अश्क, 1982 में हिंदी कहानी की भूमिका व 1997 में गोदान संवेदना और शिल्प नामक आलोचनात्मक पुस्तकें लिखीं. हाल ही में उनकी समग्र रचनाओं की कई खंडों में रचनावली प्रकाशित हुई है. डॉ कर्ण ने मूल्यांकन नाम की पत्रिका का संपादन भी शुरू किया था.

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