झारखंड हाइकोर्ट का जेपीएससी नियुक्ति पर रोक से इनकार

Author : Prabhat Khabar News Desk Published by : Prabhat Khabar Updated At : 06 Aug 2020 6:38 AM

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झारखंड हाइकोर्ट के जस्टिस डॉ एसएन पाठक की अदालत ने बुधवार को छठी संयुक्त सिविल सेवा प्रतियोगिता परीक्षा के रिजल्ट को चुनौती देनेवाली याचिका पर सुनवाई की.

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रांची : झारखंड हाइकोर्ट के जस्टिस डॉ एसएन पाठक की अदालत ने बुधवार को छठी संयुक्त सिविल सेवा प्रतियोगिता परीक्षा के रिजल्ट को चुनौती देनेवाली याचिका पर सुनवाई की. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने प्रार्थी के अंतरिम राहत देने संबंधी आग्रह नहीं माना.

अदालत ने संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम व अनुशंसित अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. साथ ही अदालत ने अन्य लंबित मामलों के साथ इसकी सुनवाई करने की बात कही. इससे पूर्व प्रार्थी की ओर से बताया कि जेपीएससी ने कुल प्राप्तांक के आधार पर रिजल्ट तैयार किया है, जिसे सही नहीं कहा जा सकता है. रिजल्ट प्रकाशित करने में गड़बड़ी हुई है. उन्होंने अनुशंसित अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर रोक लगाने का आग्रह किया.

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन और झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की ओर से अधिवक्ता संजय पिपरवाल व प्रिंस कुमार ने पैरवी की. उन्होंने प्रार्थी के आग्रह का विरोध करते हुए अदालत को बताया कि चयन प्रक्रिया व रिजल्ट तैयार करने में किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं हुई है. इसलिए नियुक्ति पर रोक लगाना उचित नहीं होगा. ज्ञात हो कि प्रार्थी मुकेश कुमार ने याचिका दायर की है. उन्होंने छठी जेपीएससी परीक्षा के परिणाम को चुनौती दी है.

सेवा से हटाये गये सिपाहियों को हाइकोर्ट से नहीं मिली राहत

झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की अनुशंसा के बाद नियुक्त किये गये सिपाहियों को सेवा से हटाये जाने के मामले में झारखंड हाइकोर्ट से राहत नहीं मिल पायी. हाइकोर्ट के जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने सेवा से हटाये जाने संबंधी सरकार के आदेश को बरकरार रखते हुए प्रार्थियों की याचिकाअओं को खारिज कर दिया.

किसी प्रकार की राहत देने से इनकार कर दिया. बुधवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत ने उक्त फैसला सुनाया. नाै जुलाई को प्रार्थियों, राज्य सरकार और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की दलील सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. प्रार्थियों की ओर से अदालत को बताया गया था कि सरकार ने सेवा से हटाने के पूर्व नियमों का पालन नहीं किया. प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ है.

posted by : sameer oraon

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