1835 से मनायी जाती है कोनहारा में दुर्गा-पूजा

Updated at : 29 Sep 2016 2:42 AM (IST)
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1835 से मनायी जाती है कोनहारा में दुर्गा-पूजा

हाजीपुर : नगर के कौनहारा घाट स्थित बड़ी दुर्गा पूजा की तैयारी जोर-शोर से चल रही है. एलइडी लाइट की सजावट इस बार यहां का विशेष आकर्षण होगा. पूजा पंडाल और सजावट पर साढ़े चार लाख रुपये के खर्च का बजट बनाया गया है. पुराने जमाने से ही यह पूजा स्थल श्रद्धालुओं की आस्था का […]

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हाजीपुर : नगर के कौनहारा घाट स्थित बड़ी दुर्गा पूजा की तैयारी जोर-शोर से चल रही है. एलइडी लाइट की सजावट इस बार यहां का विशेष आकर्षण होगा. पूजा पंडाल और सजावट पर साढ़े चार लाख रुपये के खर्च का बजट बनाया गया है. पुराने जमाने से ही यह पूजा स्थल श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है. कौनहारा घाट शहर के आखिरी छोर पर है, लेकिन दशहरे में शहर आने वाले श्रद्धालु बड़ी दुर्गा का दर्शन किये बिना नहीं लौटते.

यहीं से शुरू हुई नगर में दुर्गा पूजा की परंपरा : कौनहारा की बड़ी दुर्गा पूजा हाजीपुर नगर की सबसे प्राचीन पूजा है. यहां पूजा की परंपरा 180 साल पुरानी है. जानकारी के अनुसार 1835 में यहां दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई. नगर में मां दुर्गा की पहली प्रतिमा कौनहारा घाट पर ही बनी थी, इसलिए बड़ी दुर्गा पूजा के नाम से यह स्थान प्रसिद्ध है. इसके बाद शहर के एम चौक पर पूजा की शुरुआत हुई, जिसे छोटी दुर्गा पूजा केंद्र कहा जाता है. दोनों स्थानों पर दुर्गा पूजा के अवसर पर एक ही रूप-रंग में दो मंजिला प्रतिमा का निर्माण होता है. सिर्फ आकार का अंतर होता है. कौनहारा में बड़े और मस्जिद चौक पर इससे छोटे आकार की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं.
जब लौट आयी थी मूर्तिकार की आंखों की रोशनी
बड़ी दुर्गा पूजा के साथ मइया के चमत्कार की एक कथा जुड़ी है. बताते हैं कि मूर्तिकार सीताराम पंडित के दादा परीक्षण पंडित जब यहां प्रतिमा बनाया करते थे, तो एक साल किसी बात को लेकर पूजा समिति से अनबन होने के कारण उन्होंने मूर्ति बनाने से इनकार कर दिया था. इसके बात उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी. अगले साल फिर जब उन्होंने प्रतिमा का निर्माण शुरू किया, तो उनकी आंखों की ज्योति भी फूट आई. तब से ही यह परिवार माता की विशेष कृपा मानते हुए पीढ़ियों तक यहां प्रतिमा बनाने को संकल्पित है.
प्रतिमा निर्माण में जुटी है मूर्तिकार की पांचवीं पीढ़ी
कौनहारा घाट स्थित बड़ी दुर्गा पूजा की प्रतिमाओं को आकार देने में मूर्तिकार की पांचवीं पीढ़ी पूरी मनोयोग से लगी हुई है. जब यहां दुर्गा पूजा की परंपरा शुरू हुई, तब गोरौल प्रखंड के मजिया गांव निवासी मूर्ति शिल्पी भदई पंडित प्रतिमाओं का निर्माण करते थे. बाद में उनके पुत्र परिक्षण पंडित और उसके बाद पौत्र गुलटेनि पंडित यह काम करते थे. गुलटेनि पंडित के बाद उनके पुत्र सीताराम पंडित वर्षों से यहाँ मूर्ति बना रहे है. 70 वर्षीय सीताराम पंडित के साथ पिछले कुछ सालों से उनके पुत्र प्रमोद कुमार इस काम को कर रहे हैं.
2015 में बनी है नयी कमेटी
बड़ी दुर्गा पूजा समिति का पुनर्गठन पिछले साल हुआ है. नई कमेटी के अध्यक्ष राजकुमार श्रीवास्तव, उपाध्य्क्ष जयपत पासवान एवं विजय कुमार, सचिव रंजीत कुमार उर्फ बॉबी तथा कोषाध्यक्ष सुनील कुमार शर्मा एवं दीपक कुमार बनाए गए है. कार्यकारिणी के सदस्यों में पंकज चौधरी, रूपेश चौधरी, मनसुख, निखिल कुमार, सुमित कुमार, विजय शर्मा, पंकज शर्मा, पप्पू यादव, उमेश साह, मुकेश वर्मा, रमेश साह, अजय यादव, गोलटु सिंह, सचिन शर्मा, कृष्ण लाल, कृष्णा पंडित, दीप भारद्वाज, सरुन गुप्ता, चन्दन शामिल हैं.
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