स्वाधीनता सेनानियों का केंद्र गांधी आश्रम हो रहा बदहाल

Updated at : 14 Aug 2016 6:01 AM (IST)
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स्वाधीनता सेनानियों का केंद्र गांधी आश्रम हो रहा बदहाल

अपने दामन में कई अविस्मरणीय पहलुओं को समेटे हुए है हाजीपुर गांधी आश्रम. राष्ट्रपिता गांधी से लेकर राष्ट्रनायक भगत सिंह जैसे महान सेनानियों ने आकर जंग-ए-आजादी को परवान चढ़ाया. आज वहीं गांधी आश्रम आवारा पशुओं का चरागाह और असामाजिक तत्वों का अड्डा बन गया है. यह ऐतिहासिक स्थल राजनेताओं की खुदगर्जी और प्रशासनिक उपेक्षा का […]

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अपने दामन में कई अविस्मरणीय पहलुओं को समेटे हुए है हाजीपुर गांधी आश्रम. राष्ट्रपिता गांधी से लेकर राष्ट्रनायक भगत सिंह जैसे महान सेनानियों ने आकर जंग-ए-आजादी को परवान चढ़ाया. आज वहीं गांधी आश्रम आवारा पशुओं का चरागाह और असामाजिक तत्वों का अड्डा बन गया है. यह ऐतिहासिक स्थल राजनेताओं की खुदगर्जी और प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेल रहा है.

हाजीपुर : आजादी की लड़ाई में पूरे उत्तर बिहार के आंदोलनों का संचालन केंद्र रहा हाजीपुर का ऐतिहासिक गांधी आश्रम आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. सात दिसंबर, 1920 को महात्मा गांधी ने हाजीपुर आकर अपने हाथों से इसकी आधारशिला रखी थी. अपने दामन में कई अविस्मरणीय और स्वर्णिम पहलुओं को समेटे यह गांधी आश्रम, जहां राष्ट्रपिता गांधी से लेकर राष्ट्रनायक भगत सिंह जैसे महान सेनानियों ने आकर जंग ए आजादी को परवान चढ़ाया, राष्ट्रीय नेताओं से प्रेरित होकर वैशाली जनपद के दर्जनों देशभक्तों ने ब्रिटिश हुकूमत को हिला देने वाली गतिविधियां चलाते हुए शौर्य और बलिदान की अमिट इबारत लिख डाली थी.
आज वही गांधी आश्रम आवारा पशुओं का चरागाह और असामाजिक तत्वों का अड्डा बन गया है. यह ऐतिहासिक स्थल राजनेताओं की खुदगर्जी और प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेल रहा है.
नहीं स्थापित हो सकीं देशभक्तों की प्रतिमाएं : जिलावासियों को शहर के ऐतिहासिक गांधी आश्रम के परिसर में स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिमाएं स्थापित किये जाने का वर्षों से इंतजार है. ये प्रतिमाएं 20 वर्षों से एक कोठरी में बंद पड़ी हैं. इनकलाब का परचम लेकर वतन पे जां निसार करने वाले वैशाली के वीर सपूतों को उन्हीं की धरती पर दो गज जमीन नसीब नहीं हो रही है, जहां उनकी प्रतिमाओं को सम्मान मिल सके.
देश की आजादी के लिए अपना जीवन होम कर देने वाले वैशाली जिले के महान सपूत शहीद बैकुंठ शुक्ल, योगेंद्र शुक्ल, अक्षयवट राय, दीप नारायण सिंह, पंडित जयनंदन झा, बसावन सिंह, किशोरी प्रसन्न सिंह, सुनीति देवी, गुलजार पटेल, अमीर सिंह उर्फ अमीर गुरू जैसे नामचीन स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिमाएं बन कर दो दशक से पड़ी हुई हैं. इन प्रतिमाओं को गांधी आश्रम में स्थापित करने की योजना थी. सोच यह थी कि इससे न सिर्फ गांधी आश्रम का गौरव शाली इतिहास बुलंद होगा, बल्कि समाज की नयी पीढ़ी पुरखों के त्याग और बलिदान से प्रेरित होगी.
बड़े अरमान से बनवायी गयी थीं मूर्तियां : लगभग 22 साल पहले जिले के कुछ समाजसेवियों की पहल पर स्वतंत्रता सेनानियों की दर्जन भर प्रतिमाएं जन सहयोग से बनवायी गयी थीं. 1994 में इन मूर्तियों का निर्माण जयपुर में कराया गया था. बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के पूर्व रजिस्ट्रार डॉ विवेकानंद शुक्ल बताते हैं कि लगभग तीन लाख रुपये की लागत से इन महापुरुषों की मूर्तियां बनवायी गयी थीं. डॉ बिंदेश्वर पाठक समेत कई प्रबुद्ध लोगों ने इसमें सहयोग किया था.
प्रतिमाएं तो जयपुर से बन कर हाजीपुर पहुंच गयीं, लेकिन जब इन्हें स्थापित करने की बारी आयी तो अड़ंगेबाजी शुरू हो गयी. 1995 से ही सभी प्रतिमाएं शहर के उद्योगपति एवं समाजसेवी कृष्ण कुमार बूबना के यहां पड़ी हुई हैं. गांधी आश्रम में प्रतिमाएं लगाने के लिए शासन-प्रशासन से गुहार लगाकर जिले की कई हस्तियां थक चुकी हैं, लेकिन इस फरियाद का कोई असर नहीं हुआ.
क्या कहते हैं लोग
जिले के महान स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिमाएं पड़ी हुई हैं, उन्हें गांधी आश्रम में स्थापित करने के लिए सामाजिक स्तर पर पहल होनी चाहिए. शासन-प्रशासन की शायद ही इसमें कोई रुचि हो, लेकिन समाज के जागरूक लोगों को इसके आगे आना चाहिए.
सीताराम सिंह, पूर्व सांसद एवं स्वतंत्रता सेनानी गांधी आश्रम, हाजीपुर
गांधी आश्रम में प्रतिमाओं को लगाने के लिए नेता, मंत्री से लेकर अफसर तक गुहार लगायी. कहीं से कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला. बड़ी श्रद्धा के साथ महापुरुषों की प्रतिमाएं तैयार करायी गयी थीं. पता नहीं, किन कारणों से इन्हें वहां स्थापित नहीं किया जा रहा है. यह खेद का विषय है.
डॉ विवेकानंद शुक्ला, पूर्व रजिस्ट्रार, बिहार यूनिवसिर्टी ग्राम तितरा,
हाजीपुर
वैशाली के महान सपूतों की प्रतिमाओं की दुर्दशा देखकर दु:ख होता है. गांधी आश्रम में बहुत पहले ही ये प्रतिमाएं लग जानी चाहिए थीं. समाज के लोग भी इस बात को लेकर गंभीर नहीं हैं. मूर्तियों का नहीं लगना उन महापुरुषों का अपमान है.
डॉ व्रज कुमार पांडेय, वरिष्ठ चिंतक एवं लेखक, हाजीपुर
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