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हाजीपुर: मतदाताओं की खामोशी धुरंधरों की परेशानी, रामविलास की विरासत संभालने उतरे छोटे भाई इनसे हैं मुकाबला

Updated at : 28 Apr 2019 6:46 AM (IST)
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हाजीपुर: मतदाताओं की खामोशी धुरंधरों की परेशानी, रामविलास की विरासत संभालने उतरे छोटे भाई इनसे हैं मुकाबला

सुनील कुमार सिंह हाजीपुर : हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र राजनीतिक रूप से शुरू से ही काफी समृद्ध व दिलचस्प रहा है. पिछले चार दशकों के राजनीतिक इतिहास को देखें तो पायेंगे कि यहां राम नाम की माया का खासा असर रहा है. 1977 से 2014 तक अपनी जीत दर्ज कराने वाले रामविलास पासवान को भी दो […]

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सुनील कुमार सिंह
हाजीपुर : हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र राजनीतिक रूप से शुरू से ही काफी समृद्ध व दिलचस्प रहा है. पिछले चार दशकों के राजनीतिक इतिहास को देखें तो पायेंगे कि यहां राम नाम की माया का खासा असर रहा है.
1977 से 2014 तक अपनी जीत दर्ज कराने वाले रामविलास पासवान को भी दो बार यहां से पराजय का सामना करना पड़ा था. पहली बार 1984 में उन्हें इंडियन नेशनल कांग्रेस के उम्मीदवार रामरतन राम से तो दूसरी बार 2009 में जदयू उम्मीदवार व पूर्व मुख्यमंत्री स्व रामसुंदर दास से. इस बार रामविलास पासवान चुनावी मैदान में नहीं है. उनकी विरासत संभालने की जिम्मेदारी उनके छोटे भाई पशुपति कुमार पारस को मिली है. वे एनडीए उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में हैं.
वहीं, उनके सामने हैं महागठबंधन के उम्मीदवार पूर्व मंत्री शिवचंद्र राम. इस सीट के लिए दोनों ओर से जमकर जोर आजमाइश हो रही है. पिछले चार दशक तक यहां विकास ही मुद्दा रहा है. इस बार विकास के साथ-साथ स्थानीय व बाहरी को भी मुद्दा बनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है. वहीं, मतदाता इस बार पूरी तरह से खामोश दिख रहे हैं. चुनाव में कौन सा मुद्दा हावी होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा.
खल रही मतदाताओं की खामोशी
चुनावी मैदान में जोर आजमाइश कर रहे धुरंधरों को इस बार मतदाताओं की खामोशी अंदर-ही-अंदर परेशान कर रही है. चौक-चौराहे पर चुनावी चर्चाओं का बाजार ठंडा है. उम्मीदवारों के समर्थकों की छोड़ दें तो चुनावी मौसम में जिन नुक्कड़ों पर कभी चुनावी चर्चा का माहौल गर्म रहता था, वहां सन्नाटा पसरा हुआ है. वहीं उम्मीदवार दम छुड़ाती इस गर्मी में भी मतदाताओं को रिझाने के लिए दरवाजे से लेकर खेत-खलिहान तक में हाजिरी बनाने से नहीं चूक रहे हैं.
मुद्दे : स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक के
हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र के चुनावी मैदान में डटे राजनीतिक धुरंधर इस बार भी विकास के मुद्दे को ही ज्यादा हवा दे रहे हैं, लेकिन, चर्चा स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के मुद्दों की ही हो रही है. स्थानीय बनाम बाहरी, अगड़ी-पिछड़ी, आरक्षण और विरासत की सियासत जैसे मुद्दे इस बार चुनावी फिजां में खूब उछल रहे हैं. लेकिन मतदाता खामोश दिख रहे हैं.
1 पिछले चार दशकों तक यहां विकास ही मुख्य मुद्दा रहा है
2 मतदाताओं को रिझाने को नेता खेत-खलिहान का लगा रहे चक्कर
हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र : ये हैं विधानसभा की छह सीटें
वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के पहले तक हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र में पातेपुर विधानसभा क्षेत्र और वैशाली लोकसभा क्षेत्र में लालगंज विधानसभा क्षेत्र हुआ करते थे. लेकिन, परिसीमन के बाद लालगंज को हाजीपुर से और पातेपुर को उजियारपुर लोकसभा क्षेत्र से जोड़ दिया गया. हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र में अभी हाजीपुर, लालगंज, महुआ, राजापाकर, महनार व राघोपुर विधानसभा क्षेत्र आते हैं.
रामविलास पासवान इस बार चुनाव मैदान में नहीं
गंगा और गंडक नदी से घिरे हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र की खास पहचान यहां की फिजां में घुली चिनिया केले की मिठास के साथ-साथ एक खास शख्स व फिजां में गूंजने वाले नारे से भी रही है और वे शख्स हैं रामविलास पासवान और उनके स्वागत में समर्थकों की ओर से लगाया जाने वाला नारा. धरती गूंजे आसमान, रामविलास पासवान. चार दशक तक हाजीपुर की राजनीति के शीर्ष पर रहे रामविलास इस बार चुनावी मैदान में नहीं है. इनके छोटे भाई पशुपति चुनाव लड़ रहे हैं. 1977-2014 तक वे जीत दर्ज करते रहे. इस दौरान दो बार रामविलास पासवान को हार का सामना भी करना पड़ा.
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