बिहार में यूनिवर्सिटी पर सालाना 3500 करोड़ रुपये खर्च, पर दशकों से नहीं हुआ कोई बड़ा शोध

Updated at : 10 Jun 2021 9:53 AM (IST)
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बिहार में यूनिवर्सिटी पर सालाना 3500 करोड़ रुपये खर्च, पर दशकों से नहीं हुआ कोई बड़ा शोध

पूरे राज्य में उच्च शिक्षा पर सालाना करीब साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये खर्च होते हैं. इसमें करीब 70% राशि शिक्षकों की सैलरी पर खर्च होती है. इसके बावजूद ज्यादातर विश्वविद्यालयों में दशकों से कोई बड़ा शोध नहीं हुआ है.

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अमित कुमार, पटना. पूरे राज्य में उच्च शिक्षा पर सालाना करीब साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये खर्च होते हैं. इसमें करीब 70% राशि शिक्षकों की सैलरी पर खर्च होती है. इसके बावजूद ज्यादातर विश्वविद्यालयों में दशकों से कोई बड़ा शोध नहीं हुआ है. विवि या कॉलेजों में शोध तो हो रहे हैं, लेकिन उसे खानापूर्ति ही कहा जायेगा. कोई उत्कृष्ट शोध, जिसने राज्य को ख्याति दिलायी हो या उक्त विवि-काॅलेज का ही नाम हुआ हो, नहीं के बराबर है.

आज भी पढ़ाया जाता है नाथू नागेंद्र का साउंड डायनेमिक फॉर्मूला

इसी राज्य में दशकों पहले बड़े शोध होते थे. विवि में कई ऐसे शिक्षक व छात्र हुए, जिनका रिसर्च के लिए देशभर में नाम था. साइंस काॅलेज के पूर्व प्राचार्य व पटना विवि में केमिस्ट्री के पूर्व पीजी हेड प्रो राधाकांत प्रसाद बताते हैं कि साइंस काॅलेज के नाथू नागेंद्र नाथ का साउंड डायनेमिक का फाॅर्मूला आज तक पढ़ाया जाता है. वह गणिज्ञ स्व. वशिष्ठ नारायण सिंह के भी गुरु थे. वशिष्ठ को तो सभी जानते हैं, पर उनका फॉर्मूला ही गायब हो गया.

10 साल में खर्च हुए 30 हजार करोड़

एक अनुमान के अनुसार पिछले एक दशक की बात करें तो करीब 30 हजार करोड़ रुपये उच्च शिक्षा पर खर्च किये गये. पहले सैलरी थोड़ी कम थी, तो खर्च भी थोड़ा कम था. पटना विवि की बात करें तो 2018 में 171 करोड़ और 2019 तक सभी के वेतनादि/पेंशनादि मद में 183.05 करोड़ रुपये का अनुदान पटना विश्वविद्यालय प्राप्त हुआ.

प्रो चटर्जी की दवा अब भी चलती है विदेश में

80 के दशक में प्रो जेएन चैटर्जी की आर्थराइटिस की दवा को ब्रिटेन व अमेरिका ने मान्यता दी. रुबीफ्लेक्स, रैबीफ्लेक्स के नाम से यह दवा अब भी वहां चलती है. इसी तरह फिजिक्स के शिक्षक रहे प्रो केएन मिश्र ने हिंदी टाइपोग्राफ का ईजाद किया था. 60-70 के दशक में एक अखौरी विध्यांचल थे, जिनकी थ्योरी अखौरी सीरीज के नाम से गणित में अब भी पढ़ायी जाती है.

ऐसे अनगिनत नाम हैं, जो शोध के लिए जाने जाते हैं. प्राचीन इतिहास में बकायदा एक म्यूजियम था और पहले यहां काफी शोध पुरातत्व विभाग के साथ मिलकर होते थे. अब सब ठप है. शिक्षक भी उस तरह से अब प्रोजेक्ट नहीं करते, क्योंकि प्रक्रिया व प्रोसेस अब बहुत जटिल हो गया है और ग्रांट भी उस तरह का नहीं है. छात्रों को जेआरएफ व कुछ अन्य स्कॉलरशिप मिलती है, लेकिन वे भी बहुत कुछ बेहतर नहीं कर पा रहे हैं.

अब नाममात्र के हो रहे रिसर्च

पिछले दिनों में डॉल्फिन को लेकर साइंस कॉलेज के जूलॉजी के शिक्षक प्रो आरके सिन्हा ने राष्ट्रीय स्तर पर शोध के लिए अच्छा नाम कमाया है. पीयू के पूर्व कुलपति व भूगोल के शिक्षक प्रो सुदिप्तो अधिकारी बाॅर्डर क्षेत्र में सेना व सरकार के सहयोग से एक रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे, लेकिन अभी हाल में ही उनका देहांत हो गया.

एक पीयू आइक्यूएसी के बीरेंद्र कुमार ने भी रिसर्च को पेटेंट के लिए आइपीआर कोलकाता भेजा है. उनका तुलसी व खजूर पर एंटी एजिंग पर रिसर्च है. इसी तरह के कुछ-कुछ रिसर्च कहीं-कहीं दूसरे विश्वविद्यालयों में भी होते रहते हैं. लेकिन, कोई बड़ा आविष्कार या कोई बड़ी थ्योरी पिछले दशकों में राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध नहीं हुई है. पहले बीच-बीच में बड़े शोध होते रहते थे.

रिसर्चर, एनओयू के पूर्व कुलपति, वर्तमान में मां-वैष्णो देवी यूनिवर्सिटी, जम्मू के कुलपति प्रो आरके सिन्हा (डाल्फिन मैन) कहते हैं कि जब तक शिक्षकों व शिक्षण अधिकारियों की नियुक्ति व प्रोमोशन में रिसर्च को प्राथमिकता नहीं दी जायेगी, तब तक यही हालात रहेंगे. शिक्षकों को शोध के लिए इंसेंटिव देकर प्रोत्साहित भी करना होगा.

पटना यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो गिरीश कुमार चौधरी कहते हैं कि रिसर्च को लेकर कुछ संसाधन की भी कमी है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है. हालांकि, अब रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए विवि में तेजी से काम चल रहा है. चार रिसर्च सेंटर आने वाले दिन में पीयू में होंगे. इसके अलावा शिक्षकों को प्रोमोशन आदि में रिसर्च प्रोजेक्ट को अनिवार्य कर दिया गया है.

Posted by Ashish Jha

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