Tej Pratap Yadav: मकर संक्रांति पर लालू प्रसाद यादव ने पारंपरिक दही-चूड़ा भोज का आयोजन नहीं किया, लेकिन परिवार और पार्टी से बाहर किए गए तेज प्रताप यादव ने यह जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली. उनके आवास पर हुआ दही-चूड़ा भोज सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि वह सियासी मंच बन गया.
जहां से तेज प्रताप ने तेजस्वी यादव, राजद के कार्यकर्ताओं और पूरे राजनीतिक गलियारे को एक बड़ा संदेश दे दिया. तेजप्रताप का भोज इस बार चर्चा में इसलिए है क्योंकि इसमें विपक्ष के साथ-साथ सत्तारूढ़ दल के नेताओं को भी बुलाया गया है.
परंपरा निभाने के बहाने सियासी दावा
तेज प्रताप यादव ने जिस तरह खुद आगे बढ़कर दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया, वह सीधा-सीधा यह जताता है कि वे लालू परिवार की राजनीतिक परंपरा को अब अपने तरीके से आगे बढ़ाना चाहते हैं. पिता द्वारा छोड़ी गई जगह को भरने की यह कोशिश उन्हें सिर्फ बागी बेटे से आगे बढ़ाकर विकल्प के नेता के तौर पर पेश करती है.
तेज प्रताप का यह कदम और एक्शन साफ तौर पर तेजस्वी यादव को संदेश देने वाला है. उन्होंने दिखा दिया कि राजद के भीतर सत्ता और नेतृत्व का केंद्र अब एकतरफा नहीं रहा. दही-चूड़ा भोज के जरिए उन्होंने यह संकेत दिया कि वे सिर्फ असंतुष्ट भाई नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनने की कोशिश कर रहे हैं.
तेज प्रताप यादव ने जिस तरह खुद आगे बढ़कर दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया, वह सीधा-सीधा यह जताता है कि वे लालू परिवार की राजनीतिक परंपरा को अब अपने तरीके से आगे बढ़ाना चाहते हैं. पिता द्वारा छोड़ी गई जगह को भरने की यह कोशिश उन्हें सिर्फ “बागी बेटे” से आगे बढ़ाकर “विकल्प के नेता” के तौर पर पेश करती है.
पिता की पहचान से दूरी
यह संदेश सिर्फ तेजस्वी तक सीमित नहीं है, बल्कि राजद के कार्यकर्ताओं तक भी जाता है. तेज प्रताप यह बताना चाहते हैं कि यदि पार्टी में उन्हें जगह नहीं मिलती, तो वे अपनी अलग राह बना सकते हैं और कार्यकर्ताओं के लिए एक नया विकल्प पेश कर सकते हैं.
सबसे अहम संकेत यह रहा कि उन्होंने परिवार के सभी सदस्यों को JJD के बैनर तले बैठाया. मंच पर पार्टी का नाम और पहचान उनकी अपनी थी, न कि लालू प्रसाद यादव की विरासत से जुड़ी हुई. पिता का नाम हटाकर और परिवार को बुलाकर उन्होंने यह जताया कि अब उनकी राजनीति “लालू के बेटे” की नहीं, बल्कि “तेज प्रताप” की अपनी पहचान पर टिकी होगी.
तेजस्वी के खिलाफ खिंची बड़ी लकीर
इस पूरे आयोजन को तेजस्वी यादव के खिलाफ एक बड़ी लकीर के रूप में देखा जा रहा है. तेज प्रताप ने संकेत दिया कि राजद में तेजस्वी का नेतृत्व अब निर्विवाद नहीं रहा. उनका संदेश साफ है कि तेजस्वी के नेतृत्व में पार्टी धीरे-धीरे सिमट रही है और वे खुद एक नए राजनीतिक केंद्र के तौर पर उभर सकते हैं.
तेज प्रताप का दही-चूड़ा भोज सिर्फ एक सांस्कृतिक परंपरा का निर्वहन नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नई धुरी गढ़ने की कोशिश है. यह तेजस्वी, राजद कार्यकर्ताओं और एनडीए सभी के लिए संकेत है कि लालू परिवार की राजनीति अब एक दिशा में नहीं, बल्कि कई धाराओं में बंटने लगी है.

