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लोस से विस तक महिलाओं ने लिखी सफलता की इबारत

Updated at : 02 Nov 2025 5:51 PM (IST)
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लोस से विस तक महिलाओं ने लिखी सफलता की इबारत

महिलाओं ने दिखाया राजनीतिक प्रभाव

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सुपौल. मिथिला की पवित्र धरती सुपौल में अब महिला सशक्तिकरण नयी पहचान के साथ उभर रही है. कभी राजनीति के मंच पर महिलाओं की उपस्थिति सीमित मानी जाती थी, लेकिन आज यह तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. लोकसभा से लेकर विधानसभा तक, सुपौल की महिलाओं ने अपनी मेहनत, निष्ठा और नेतृत्व क्षमता से राजनीति के क्षितिज पर चमक बिखेरी है. अब महिलाएं केवल मतदाता नहीं, बल्कि नीति-निर्माता बन चुकी हैं. गांव की चौपालों से लेकर शहर की सियासी गलियों तक, महिलाओं की आवाज गूंजने लगी है. सुपौल का राजनीतिक सफर अब महिलाओं की भागीदारी के बिना अधूरा नहीं रह गया है. लोकसभा चुनावों में भी महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया था. उस दौर में भी यह संकेत साफ था कि महिलाएं अब सियासत की मुख्यधारा में आने लगी हैं. इसके बाद हुए लोकसभा चुनावों में महिला मतदाताओं की सक्रियता लगातार बढ़ी. वर्ष 2019 के आम चुनाव में सुपौल लोकसभा सीट पर महिला मतदान प्रतिशत 71 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो औसत मतदान प्रतिशत से अधिक था. यह साबित करता है कि महिलाएं अब केवल मतदान के अधिकार तक सीमित नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सशक्त भागीदार बन गयी हैं. विधानसभा चुनाव में भी महिलाओं का दबदबा बना रहा. जिले की 05 विधानसभा सीटों पर वर्ष 2020 के चुनाव में 11 महिला प्रत्याशी मैदान में थी. इनमें से 01 महिला उम्मीदवार ने शानदार जीत दर्ज की. इससे पूर्व 2010 के विधानसभा चुनाव में दो महिलाओं ने विधानसभा क्षेत्र से जीतकर अपना परचम लहराया था. यह सफलता केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि महिला सशक्तीकरण की सामूहिक विजय है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुपौल में महिलाओं के शिक्षा स्तर, सामाजिक जागरूकता और स्वावलंबन में आयी बढ़ोतरी ने इस बदलाव को संभव बनाया है. पंचायत स्तर पर मिले आरक्षण ने भी उन्हें नेतृत्व का आत्मविश्वास दिया, जिसका असर अब राष्ट्रीय और प्रांतीय राजनीति तक देखा जा रहा है. स्थानीय समाजसेविका संगीता कुमारी कहती हैं, “पहले महिलाएं मतदान तक सीमित थी, अब वे चुनाव लड़ रही हैं और जीत भी रही हैं. यह बदलाव सुपौल की सामाजिक चेतना और महिलाओं की आत्मनिर्भरता का प्रतीक है.” महिलाओं के इस राजनीतिक उदय ने जिले के विकास की दिशा भी बदली है. वे अब न केवल चुनाव जीत रही हैं बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, जल-जीवन-हरियाली जैसे जनहित कार्यों में भी नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं. आत्मविश्वास और नेतृत्व की मिसाल शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक जागरूकता के संगम ने सुपौल की महिलाओं को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया है. घर की चारदीवारी से निकलकर उन्होंने जनसेवा को अपना लक्ष्य बनाया है. आज वे समाज के हर वर्ग में प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं. सुपौल की महिलाएं अब सिर्फ वोट नहीं देतीं, वे दिशा देती हैं, निर्णय लेती हैं और विकास की कहानी खुद लिख रही हैं. महिलाओं ने दिखाया राजनीतिक प्रभाव सुपौल जिले की राजनीति में पिछले एक दशक से महिलाओं का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है. लोकसभा से लेकर विधानसभा तक, महिला उम्मीदवारों ने यहां अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में सुपौल संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार रंजीत रंजन ने शानदार जीत दर्ज कर संसद में पहुंचकर जिले का प्रतिनिधित्व किया. उनकी जीत ने जिले में महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल पेश की थी. विधानसभा स्तर पर भी महिलाओं का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा है. 2010 के विधानसभा चुनाव में पिपरा सीट से सुजाता देवी और त्रिवेणीगंज सीट से अमला सरदार ने जीत हासिल कर विधानसभा तक पहुंचने में सफलता पाई थी. इसके बाद 2015 के विधानसभा चुनाव में त्रिवेणीगंज से वीणा देवी ने जीत दर्ज की और 2020 के चुनाव में भी पुनः वीणा देवी ने अपनी सीट बरकरार रखी, जिससे क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता और मजबूत हुई है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुपौल जिले में महिलाओं की सक्रियता और नेतृत्व क्षमता ने यहां की राजनीति को नई दिशा दी है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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RAJEEV KUMAR JHA

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By RAJEEV KUMAR JHA

RAJEEV KUMAR JHA is a contributor at Prabhat Khabar.

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