जन्मजात परंपरा से व्यथित हैं कुम्हार
जन्मजात परंपरा से व्यथित हैं कुम्हार फोटो – 10कैप्सन – चाक पर मिट्टी के बरतन बनाते कुम्हार.प्रतिनिधि, सुपौल दीपावली के त्योहार मनाये जाने को लेकर जिले भर के लोग उत्साहित हैं. त्योहार को लेकर कोसी इलाके में जगह-जगह कुम्हारों द्वारा मिट्टी के दीप सहित अन्य सामग्री तैयार की जा रही है. स्वच्छ जीवन व्यतीत किये […]
जन्मजात परंपरा से व्यथित हैं कुम्हार फोटो – 10कैप्सन – चाक पर मिट्टी के बरतन बनाते कुम्हार.प्रतिनिधि, सुपौल दीपावली के त्योहार मनाये जाने को लेकर जिले भर के लोग उत्साहित हैं. त्योहार को लेकर कोसी इलाके में जगह-जगह कुम्हारों द्वारा मिट्टी के दीप सहित अन्य सामग्री तैयार की जा रही है. स्वच्छ जीवन व्यतीत किये जाने को लेकर प्राचीन काल के समाज में वर्ण व्यवस्था का स्वरूप बनाया गया था, जहां प्रत्येक वर्ण का कार्य भी निर्धारित किया गया था. संबंधित लोग अपना -अपना कार्य कर समाज की हर जरूरत को पूरा करते थे. जो बाद के समय में वर्ण गत न रह कर जन्मजात का स्वरूप ले लिया. जन्मजात परंपरा रहने के कारण कुम्हार समुदाय व्यथित है. वर्तमान परिवेश में इस तरह की परंपरा का निर्वाह खास कर मिथिलांचल क्षेत्र में अब भी देखने को मिल रहा है. कई पीढ़ी से कर रहे यह कार्यमुख्यालय स्थित वार्ड नंबर 21 निवासी लालेश्वर पंडित ने बताया कि उनकी कई पीढ़ी से मिट्टी के विविध प्रकार के बरतन सहित अन्य सामग्री का निर्माण किया जाता रहा है. लोगों द्वारा उक्त सामग्री के एवज में उन्हें राशि दी जाती है. इससे उनका व परिवार का गुजारा चलता है. पूर्व में दीपावली के त्योहार के मौके पर काफी मिट्टी के नक्काशीदार सामग्री की बिक्री होती थी, लेकिन वर्तमान समय में बिजली की विभिन्न तरह की सामग्री बाजार में उपलब्ध हो जाने के कारण उनके रोजगार पर व्यापक असर पड़ रहा है. सरकार द्वारा उन लोगों द्वारा बनाये जा रहे मिट्टी के बरतन पर किसी प्रकार का सहयोग नहीं दिया जा रहा है. व्यवसाय है सामाजिक विवशता श्री पंडित ने बताया कि उनके द्वारा मिट्टी के वर्तन बनाया जाना सामाजिक विवशता भी है. बताया कि रुढ़िवादी परंपरा प्राचीन काल से ही मानव जीवन में स्थापित हैं. जिस कारण समाज में आयोजित होने वाले किसी भी तरह के संस्कार व त्योहारों में मिट्टी के सामग्रियों की आवश्यकता होती है. वे लोग इस कार्य को छोड़ अन्य कार्य करेंगे, तो सामाजिक पाप के भागी बनेंगे. इस कारण वे पुश्तैनी परंपरा को अपनाये हुए हैं.मिट्टी ही है जीवनश्री पंडित ने ‘मांटी कहे कुम्हार से – तू क्या रौंदे मोय, इक दिन ऐसा आयेगा – मैं रोदुंगी तोय’ इस उक्ति को सुनाते हुए कहा कि मानव धरती पर खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही जाता है. परोपकार ही मानव का धर्म है. बताया कि प्रत्येक मानव को धर्म गत आचरण कर आर्थिक उपार्जन करना चाहिए. उन्होंने बताया कि जो व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए कार्य करता है. उसको मोक्ष भी आसानी के साथ नहीं मिलता.
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