सीवान : 1930 में गिरफ्तार हुए, 1936 में जेल में मौत, जानिए कौन हैं गोरेयाकोठी के सैयद सज्जाद हसनैन जिन्हें आज भी किया जाता है याद

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सैयद सज्जाद हसनैन की फाइल फोटो

Syed Sajjad Hasnain : गोरेयाकोठी प्रखंड के मुस्तफाबाद के स्वतंत्रता सेनानी सैयद सज्जाद हसनैन ने अंग्रेजों के खिलाफ कई आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई. महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन में अपना जीवन समर्पित कर दिया.

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Syed Sajjad Hasnain : सीवान के गोरेयाकोठी प्रखंड के मुस्तफाबाद गांव के स्वतंत्रता सेनानी सैयद सज्जाद हसनैन ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कई आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई थी. परिवार के अनुसार वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़े रहे. वर्ष 1930 में गिरफ्तारी के बाद उन्हें जेल भेजा गया. परिवार के मुताबिक 1936 में गुलजारबाग जेल में उनकी मौत हुई. आज भी उनका परिवार उनके संघर्ष और बलिदान को याद करता है.

मुस्तफाबाद की धरती से अंग्रेजों के खिलाफ उठी आवाज

आजादी की लड़ाई केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं थी. गांवों और कस्बों से भी बड़ी संख्या में लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन में भाग लिया. गोरेयाकोठी प्रखंड के मुस्तफाबाद गांव के सैयद सज्जाद हसनैन भी ऐसे ही स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने परिवार के अनुसार देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया.

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28 सितंबर 1891 को मुस्तफाबाद में हुआ जन्म

सैयद सज्जाद हसनैन का जन्म 28 सितंबर 1891 को मुस्तफाबाद में हुआ था. उनके पिता सैयद मोहम्मद जान क्षेत्र के प्रतिष्ठित जमींदार बताए जाते हैं. उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के मक्तब में हुई. आसपास उच्च शिक्षा की व्यवस्था नहीं होने के कारण परिवार ने घर पर ही उनकी पढ़ाई की व्यवस्था की थी.

परिवार में भी रहा शिक्षा और स्वतंत्रता आंदोलन का जुड़ाव

उनके बड़े भाई सैयद जहीर हसनैन शिक्षक थे. दूसरे भाई सैयद जफर हसनैन भी स्वतंत्रता सेनानी थे और लंबे समय तक मुस्तफाबाद पंचायत के मुखिया रहे. परिवार के अनुसार अंग्रेजी शासन के खिलाफ विरोध की भावना सज्जाद हसनैन में बचपन से ही थी.

गांधी के विचारों से प्रभावित होकर आंदोलन में उतरे

परिवार के अनुसार महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर सैयद सज्जाद हसनैन असहयोग आंदोलन में शामिल हुए. उन्होंने सारण क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन को गति देने वाले कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ काम किया. इनमें मौलाना मजहरूल हक, नारायण प्रसाद सिंह, बाबू कृष्णकांत सिंह, रामनगीना शर्मा, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जगलाल चौधरी, शिवबचन भक्त और इंद्रदीप सिन्हा जैसे नाम परिवार की ओर से बताए गए हैं.

1927 में गांधी के सारण दौरे से भी जुड़ा नाम

परिवार के अनुसार वर्ष 1927 में महात्मा गांधी के सारण आगमन के दौरान भी सैयद सज्जाद हसनैन की भूमिका रही थी. परिवार का कहना है कि गांधी उनके कार्यों से प्रभावित हुए थे और उन्होंने क्षेत्र के लोगों से अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया था.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद से भी बताए जाते हैं आत्मीय संबंध

देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद से भी सैयद सज्जाद हसनैन के आत्मीय संबंध बताए जाते हैं. परिवार के मुताबिक डॉ. राजेंद्र प्रसाद कई बार अपने मित्र से मिलने मुस्तफाबाद आए थे. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान दोनों के बीच संपर्क और मित्रता की बात परिवार की ओर से कही गई है.

नमक सत्याग्रह में भी निभाई सक्रिय भूमिका

वर्ष 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए नमक सत्याग्रह में भी सैयद सज्जाद हसनैन की सक्रिय भागीदारी बताई जाती है. इसी दौरान उनकी मुलाकात श्रीकृष्ण सिंह से हुई थी, जो बाद में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री बने. परिवार के अनुसार आंदोलन की गतिविधियों में उनकी भागीदारी लगातार बनी रही.

धरसाना सत्याग्रह की तैयारी के दौरान हुई गिरफ्तारी

परिवार के अनुसार धरसाना सत्याग्रह की तैयारी के दौरान मई 1930 में अंग्रेजी हुकूमत ने सैयद सज्जाद हसनैन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इसके बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन में उनकी सक्रियता भी जारी रही. इसी क्रम में उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर गुलजारबाग जेल भेजे जाने की बात परिवार की ओर से कही गई है.

जेल में यातना देने का परिवार का दावा

परिवार का दावा है कि जेल में अंग्रेजी अधिकारियों ने स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े साथियों के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए उन्हें कई तरह की यातनाएं दीं. परिवार के अनुसार सैयद सज्जाद हसनैन ने किसी भी साथी के बारे में जानकारी देने से इनकार कर दिया.

17 सितंबर 1936 को गुलजारबाग जेल में मौत

परिवार के अनुसार 17 सितंबर 1936 को गुलजारबाग जेल में सैयद सज्जाद हसनैन की मौत हो गई. परिजनों का दावा है कि उन्हें जहर देकर मार दिया गया और जेल परिसर में ही सुपुर्द-ए-खाक किया गया. उनकी मौत से जुड़ी यह जानकारी परिवार की ओर से दी गई है.

सामाजिक क्षेत्र में भी सक्रिय रहे सज्जाद हसनैन

स्वतंत्रता आंदोलन के साथ सैयद सज्जाद हसनैन की सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता भी बताई जाती है. वर्ष 1924 में उन्होंने अंजुमन-ए-जाफरिया की स्थापना की थी. परिवार के अनुसार यह संस्था आज भी संचालित है और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ी हुई है.

1972 में इंदिरा गांधी ने परिजनों को दिया ताम्रपत्र

देश की आजादी के बाद स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के सम्मान में 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा उनके परिजनों को ताम्रपत्र दिए जाने की जानकारी परिवार की ओर से दी गई है. परिवार इसे अपने पूर्वज के स्वतंत्रता संघर्ष की सरकारी मान्यता से जोड़कर देखता है.

आज भी मुस्तफाबाद में रहता है परिवार

सैयद सज्जाद हसनैन के परिवार के सदस्य आज भी मुस्तफाबाद में रहते हैं. उनके पौत्र इकबाल जाफरी उर्फ सोनू बाबू कहते हैं कि देश की आजादी के लिए उनके पूर्वज का संघर्ष और बलिदान पूरे जिले के लिए गर्व की बात है.

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा है उनका जीवन

परिवार के अनुसार सैयद सज्जाद हसनैन का जीवन नई पीढ़ी को देशप्रेम, साहस और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा देता है. गांव में आज भी उनके संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान को याद किया जाता है.

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