सीवान का बंगरा गांव: जहां जन्मे 27 स्वतंत्रता सेनानी, आज भी जिंदा है आजादी की गौरवगाथा

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स्वतंत्रता सेनानी मुंशी सिंह की फाइल फोटो

सीवान के बंगरा गांव ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में 27 वीर सपूतों को जन्म दिया. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान यहां के स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ असाधारण साहस दिखाया. एक जीवित स्वतंत्रता सेनानी की जुबानी सुनिए अत्याचारों और बलिदान की अनूठी कहानी.

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Siwan Freedom Fighters: सीवान जिले के महाराजगंज प्रखंड का बंगरा गांव भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अपनी अलग पहचान रखता है. यह गांव 27 स्वतंत्रता सेनानियों की जन्मस्थली के रूप में जाना जाता है. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान यहां के वीर सपूतों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी और कई स्वतंत्रता सेनानियों ने यातनाएं सहने के बावजूद देश की आजादी के लिए संघर्ष जारी रखा.

अमर शहीद देवशरण सिंह सहित कई सेनानियों ने दिया सर्वोच्च बलिदान

बंगरा गांव के अमर शहीद देवशरण सिंह अंग्रेजों की गोली से शहीद हो गए थे. गांव के लोगों का कहना है कि देश में शायद ही कोई ऐसा गांव होगा, जहां से एक साथ 27 स्वतंत्रता सेनानी निकले हों. इस गांव के स्वतंत्रता सेनानियों में देवशरण सिंह, रामलखन सिंह, टुकड़ सिंह, गजाधर सिंह, रामधन राम, रामपृत सिंह, सुंदर सिंह, रामपरीक्षण सिंह, शालीग्राम सिंह, गोरख सिंह, फेंकु सिंह, जुठन सिंह, काली सिंह, सूर्यदेव सिंह, बमबहादुर सिंह, राजनारायण उपाध्याय, रामएकबाल सिंह, तिलेश्वर सिंह, देवपूजन सिंह, रघुवीर सिंह, नागेश्वर सिंह, शिव कुमार सिंह, झूलन सिंह, राजाराम सिंह, सीताराम सिंह, मुंशी सिंह और सुरेंद्र प्रसाद सिंह शामिल हैं.

अंग्रेजों ने घरों में लगाई आग, लेकिन नहीं टूटा हौसला

ग्रामीणों के अनुसार जब अंग्रेज स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार नहीं कर सके तो उन्होंने गोरख सिंह, सीताराम सिंह और राजाराम सिंह जैसे सेनानियों के घरों में आग लगा दी. इसके बावजूद गांव के वीरों का मनोबल नहीं टूटा और वे आजादी की लड़ाई में डटे रहे.

महाराजगंज में बनी थी 'वीरबाकुड़ों' की टोली

महाराजगंज में स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने के लिए 'वीरबाकुड़ों' की एक टोली बनाई गई थी. इसमें फुलेना प्रसाद, देवशरण सिंह, चंद्रमा प्रसाद, किशोरी सोनार, बंशीलाल, गणेश डोम, मलखन सिंह, मुंशी सिंह, सीताराम सिंह, सुरेंद्र सिंह, बमबहादुर, गोरख सिंह और कृष्णाकांत सिंह समेत कई लोग शामिल थे. सभी को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं, जबकि बैठकों का मुख्य केंद्र महाराजगंज था.

16 अगस्त 1942 को अंग्रेजी हुकूमत को दी खुली चुनौती

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 16 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के आह्वान पर महाराजगंज के स्वतंत्रता सेनानियों ने रेलवे स्टेशन, रजिस्ट्री कचहरी और थाने में आग लगा दी थी. इसके बाद अंग्रेजी सैनिकों ने फुलेना प्रसाद, देवशरण सिंह, किशोरी साह, चंद्रमा प्रसाद समेत सात युवाओं पर गोलियां चला दी थीं.

स्वतंत्रता आंदोलन की रणनीति का भी रहा केंद्र

ग्रामीणों के अनुसार भारत छोड़ो आंदोलन के समय बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय महामाया प्रसाद के घर पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद और मौलाना मजहरूल हक जैसे नेताओं का आना-जाना होता था, जहां आंदोलन की रणनीति तैयार की जाती थी.

92 वर्षीय मुंशी सिंह आज भी हैं जीवित

बंगरा गांव के 27 स्वतंत्रता सेनानियों में 92 वर्षीय मुंशी सिंह आज भी जीवित हैं. भारत छोड़ो आंदोलन की 77वीं वर्षगांठ पर उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सम्मानित किया गया था. उनके साथ बिहार के अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को भी सम्मान मिला था.

अंग्रेजों के अत्याचार की कहानी आज भी सुनाते हैं मुंशी सिंह

स्वतंत्रता सेनानी मुंशी सिंह आज भी अंग्रेजों के अत्याचार की घटनाएं सुनाते हैं. उनका कहना है कि महाराजगंज में स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व उमाशंकर प्रसाद कर रहे थे. नमक सत्याग्रह, छात्रों को राष्ट्रभक्ति की शिक्षा देने और अंग्रेजों का विरोध करने के कारण 1942 में अंग्रेजों ने उन्हें देखते ही गोली मारने का आदेश जारी कर दिया था. इसके बाद वे भूमिगत हो गए और आंदोलनकारियों की आर्थिक मदद करते रहे.

मुंशी सिंह बताते हैं कि वर्ष 1928 में महात्मा गांधी के महाराजगंज आगमन पर उमाशंकर प्रसाद ने उन्हें 1001 रुपये की थैली भेंट की थी, ताकि स्वतंत्रता आंदोलन को आर्थिक मजबूती मिल सके. इससे नाराज अंग्रेजों ने उनके विद्यालय में आग लगा दी और उनकी दुकान लूट ली. आजादी के बाद भी उमाशंकर प्रसाद ने सरकार से किसी प्रकार का मुआवजा लेने से इंकार कर दिया.

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अफजल अनवर

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