दाहा नदी अब ले चुकी है नाले का शक्ल

नदियों के साथ मानव सभ्यता के इतिहास की कड़ी जुड़ी रही है.इन नदियों में दाहा नदी भी एक है.जिसे पौराणिक इतिहास में बाणेश्वरी नदी के नाम से भी जाना जाता है.सीवान शहर सहित छह प्रखंडों से होकर गुजरनेवाली दाहा नदी की कभी बहती कल -कल धारा खेतों की सिंचाई से लेकर सांस्कृतिक महत्व के लिहाज से प्रमुख रही है, पर पिछले आधा दशक में लगातार नदी के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराते गया
जीतेंद्र उपाध्याय,सीवान. नदियों के साथ मानव सभ्यता के इतिहास की कड़ी जुड़ी रही है.इन नदियों में दाहा नदी भी एक है.जिसे पौराणिक इतिहास में बाणेश्वरी नदी के नाम से भी जाना जाता है.सीवान शहर सहित छह प्रखंडों से होकर गुजरनेवाली दाहा नदी की कभी बहती कल -कल धारा खेतों की सिंचाई से लेकर सांस्कृतिक महत्व के लिहाज से प्रमुख रही है, पर पिछले आधा दशक में लगातार नदी के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराते गया.लिहाजा अब यह आबादी के बीच मौजूद नालों का पानी व कचरा गिरने से खुद नाले का शक्ल ले चुकी है.जिसे बचाने को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं सहित प्रशासनिक अफसरों की कोशिश अब तक धरातल पर नहीं उतर पायी. सीवान व गोपालगंज जिले की दाहा नदी जीवनरेखा मानी जाती रही है.यह बाण गंगा व बाणेश्वरी के नाम से ही पौराणिक कथाओं में दर्ज है.तकरीबन एक सौ किलोमीटर से लंबी नदी गोपालगंज के सासामुसा से निकलकर सीवान जिले में 85 किलोमीटर हिस्से में बहती है.यह आगे जाकर सारण जिले में फुलवरिया ताजपुर के निकट घाघरा नदी में मिल जाती है.पौराणिक कथाओं के अनुसार जब भगवान राम की बारात जनकपुर से अयोध्या लौट रही थी,तब सीता माता की प्यास बुझाने के लिये लक्ष्मण जी ने धरती पर बाण चलाकर इस नदी को प्रकट किया.इसलिये इसे बाण गंगा कहा जाता है. बड़हरिया से सिसवन तक है नदी का फैलाव दाहा नदी गोपालगंज जिले से सीवान में बड़हरिया प्रखंड में प्रवेश करती है,जो सीवान सदर प्रखंड से हुसैनगंज,आंदर, हसनपुरा होते हुए सिसवन प्रखंड से होकर सारण जिले को चली जाती है. जिसके चलते इन प्रखंडों के सैकड़ों गांव के विकास का सीधा रिश्ता रहा है.बड़हरिया का बदरजीमी बाजार,सीवान शहर का महादेवा,हुसैनगंज का बाजार व टेढ़ी घाट,आंंदर बाजार,हसनपुरा का उसरी हसनपुरा,सिसवन का चैनपुर बाजार के विकास को दाहा नदी ने ही विस्तार दिया. न तो प्रवाह बचा है और न ही जलीय जीवन दाहा नदी लुप्त होने की कगार पर है.जिले की जीवनरेखा मानी जाने वाली यह नदी आज किसी नाले के समान दिखाई देती है. 80 के दशक के बाद से ही दाहा धीरे धीरे प्रदूषण की चपेट में आने लगी थी. यह बेहद दुखद है कि लाखों लोगो के जीवन से जुडी एक नदी आज आबादी के बोझ तले दबकर एक संकुचित सा नाला बन कर रह गयी है.दो लाख से अधिक आबादी वाले जिला मुख्यालय के घरों का गंदा पानी हो या अस्पतालों से निकले कचरा हर दिन इसी नदी में बहती है.लिहाजा एक शोध के मुताबिक नदी के दुषित होने से इसमें मात्र 34 तरह की ही मछलियां रह गई हैं,जबकि पूर्व में 64 प्रजातियों की मछलियां पाई जाती थीं.अब प्रदूषण और जल स्तर की कमी के कारण जल जीव भी समाप्त हो रहे हैं.
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