परम ब्रह्म के नेत्र हैं श्री सूर्यदेव

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परम ब्रह्म के नेत्र हैं श्री सूर्यदेव फोटो नंबर- 47 आचार्य शिवशंकर झा सीतामढ़ी. यजुर्वेद में यह आया है कि श्री सूर्यदेव परम ब्रह्म के नेत्र हैं जो सभी प्राणियों के रक्षक हैं. इसी कारण इन्हें पंच देवोपासना व नौ ग्रहों के उपासना में प्रथम स्थान प्राप्त है. श्री सूर्यदेव की उपासना सृष्टि के प्रारंभ […]

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परम ब्रह्म के नेत्र हैं श्री सूर्यदेव फोटो नंबर- 47 आचार्य शिवशंकर झा सीतामढ़ी. यजुर्वेद में यह आया है कि श्री सूर्यदेव परम ब्रह्म के नेत्र हैं जो सभी प्राणियों के रक्षक हैं. इसी कारण इन्हें पंच देवोपासना व नौ ग्रहों के उपासना में प्रथम स्थान प्राप्त है. श्री सूर्यदेव की उपासना सृष्टि के प्रारंभ से ही है. वैसे भविष्यों पुराण के अनुसार, मानव लोक में राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या के द्वारा छठ का प्रारंभ माना जाता है. कहा जाता है कि कश्यप ऋषि के यज्ञ मंडप में नाग कन्या को पूजन करते देख सुकन्या ने भी जिज्ञासा की. इस पर नाग कन्या ने उसे श्री सूर्यदेव की उपासना की विधि बतायी. नगर पंचायत डुमरा के कैलाशपुरी स्थित मठ के महंत आचार्य पंडित शिवशंकर झा ने बताया कि छठ का पर्व द्रौपदी व पांडवों से भी जुड़ी हुई है. वनवास काल में दुर्वासा के भय से मुक्त होने के लिए धौम्य ऋषि ने द्रौपदी को श्री सूर्यदेव का व्रत व उपासना करने का नियम बताया था. जिसके प्रभाव से श्री भास्कर देव द्वारा उन्हें अक्षय पात्र प्राप्त हुआ था. अर्जुन के पर पौत्र एवं परीक्षित के पुत्र राजा जनमेजय को श्री वैशभ्पायन ने छठ व्रत की दीक्षा दी थी.

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