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यक्ष्मा केंद्र में एमओटीसी चिकित्सक नहीं, मरीजों काे परेशानी

Updated at : 18 May 2018 5:37 AM (IST)
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यक्ष्मा केंद्र में एमओटीसी चिकित्सक नहीं, मरीजों काे परेशानी

स्वास्थ्य सचिव को एमओटीसी को पदस्थापित करने के लिए कई बार किया गया है पत्राचार: सीएस टेक्निशियन या एसटीएस के परामर्श से नहीं, बल्कि उनके परामर्श से मरीज को दी जाती है दवा: सीडीओ शिवहर : सदर अस्पताल स्थित जिला यक्ष्मा केंद्र में एमओटीसी के बिना ही यक्ष्मा केंद्र में मरीजों का इलाज किया जाता […]

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स्वास्थ्य सचिव को एमओटीसी को पदस्थापित करने के लिए कई बार किया गया है पत्राचार: सीएस

टेक्निशियन या एसटीएस के परामर्श से नहीं, बल्कि उनके परामर्श से मरीज को दी जाती है दवा: सीडीओ
शिवहर : सदर अस्पताल स्थित जिला यक्ष्मा केंद्र में एमओटीसी के बिना ही यक्ष्मा केंद्र में मरीजों का इलाज किया जाता है. वर्ष 2016 के पूर्व संविदा पर बहाल एमओटीसी डॉ भूपेंद्र कुमार यहां मरीजों की चिकित्सा सेवा मुहैया कराते थे. जिनकी नियुक्ति विभाग द्वारा नियमित चिकित्सक के रूप में सदर अस्पताल में कर दी गयी. उसके बाद से अब यहां टेक्निशियन व एसटीएस ही मरीजों की जांच करते हैं. चौकाने वाली बात है कि मरीजों को इनके जांच के आधार पर दवा भी खिलायी जाती है.
कारण कि जब यक्ष्मा केंद्र में एमओटीसी नहीं है, तो फिर दवा किसके जांच रिपोर्ट के आधार पर दी जाती है. जाहिर सी बात है कि विभागीय एसटीएस पवन कुमार ठाकुर व टेक्निशियन गणेश कुमार के जांच के आधार पर दवा मरीजों को दी जाती है. दोनों कर्मियों ने स्वीकार किया है कि एमओटीसी करीब दो वर्षों से कार्यरत नहीं है. ऐसे में उनके जांच रिपोर्ट के आधार पर दवा दी जाती है. कहा कि बलगम की जांच टेक्निशियन के द्वारा की जाती है.
जबकि हाल के दिनों से बलगम जांच की उच्च तकनीक सिविनेट के द्वारा जांच की जा रही है. अब सवाल है कि वैसे मरीज जो टीबी रोग से ग्रसित हैं. बार बार दवा खाते व छोड़ते हैं. वैसे निगेटिव मरीज की बलगम जांच में अक्सर टीबी के बात सामने नहीं आती है. किंतु टीबी रहता है व उन्हें दवा की जरूरत भी रहती है. इस तरह के मरीज जहां चिकित्सा से वंचित रहते हैं. या अनुमान के आधार पर दवा दिया जाता है.
पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही सामने आ रही है. इस बाबत पूछे जाने पर यक्ष्मा के सीडीओ संतोष कुमार ने टेक्निशियन या एसटीएस के परामर्श के आधार पर मरीज को दवा देने की बात को खारिज कर दिया.
कहा पीएचसी से रेफर मरीज व अन्य को उनके परामर्श पर दवा दी जाती है. किंतु सूत्रों की माने तो उनको यक्ष्मा केंद्र में चिकित्सा करते नहीं देखा जाता है. कहा कि एमओटीसी के नियुक्ति हेतु विभाग को कई बार पत्र लिखा गया. किंतु विभाग द्वारा किसी भी चिकित्सक की नियुक्ति इस पद पर नहीं की गयी है. सिविल सर्जन बिसंभर ठाकुर ने कहा कि डीएम व उनके स्तर से स्वास्थ्य विभाग के सचिव को एमओटीसी चिकित्सक को पदस्थापित करने के लिए पत्र भेजा गया है. किंतु विभाग द्वारा अब तक किसी भी चिकित्सक को एमओटीसी के पद पर पदस्थापित नहीं किया गया है.
डॉ भूपेंद्र कुमार को यक्ष्मा केंद्र में प्रतिनियुक्त करने के सवाल पर कहा कि वर्ष 2015 में विशेष सचिव आनंद किशोर द्वारा निर्गत पत्र के अनुसार सिविल सर्जन या जिला स्वास्थ्य समिति के अध्यक्ष किसी चिकित्सक की प्रतिनियुक्ति नहीं कर सकते हैं. सिविल सर्जन के दोनों हाथ खड़ा करने के बाद साफ हो गया कि फिलहाल यक्ष्मा केंद्र भगवान भरोसे ही संचालित होगा. अब सवाल है उचित चिकित्सा के अभाव में मरीजों के मौत के लिए जिम्मेवार कौन होगा.
हालांकि, विभागीय आंकड़ों पर गौर करें तो एमओटीसी के नहीं रहने से टीबी के मरीजों की संख्या में कमी आयी है. पीड़ित मरीज अन्यत्र पलायन कर रहे हैं. वर्ष 2014 में जिले में 600 यक्ष्मा रोगी सामने आये. जबकि वर्ष 2015 में 625 मरीज को निबंधित किया गया. तरियानी में 120 व शिवहर पीएचसी से रेफर 333 मरीजों की जांच व दवा की उपलब्धता सुनिश्चित की गयी. किंतु एमओटीसी के नहीं रहने के कारण वर्ष 2017 में मरीजों की संख्या अचानक घट गयी. मात्र 270 मरीज ही निबंधित किये गये. जबकि 2018 में अब तक 99 मरीज को निबंधित किया गया है.
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