औषधीय मशरूम की खेती से हर महीने 40 हजार तक कमाई, पूसा विश्वविद्यालय देगा मुफ्त प्रशिक्षण

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पूसा विश्वविद्यालय में औषधीय मशरूम की खेती

Bihar Mushroom Farming: पूसा विश्वविद्यालय ने बिहार में औषधीय मशरूम की खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है. वैज्ञानिकों के अनुसार महिलाएं घर के छोटे कमरे से भी हर महीने 30 से 40 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर सकती हैं. विश्वविद्यालय खेती से लेकर मार्केटिंग तक का प्रशिक्षण देगा.

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समस्तीपुर के पूसा से सुभाष चंद्र कुमार की रिपोर्ट

Bihar Mushroom Farming: डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (RPCAU), पूसा ने बिहार में औषधीय मशरूम की खेती को बढ़ावा देने और ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में विशेष पहल शुरू की है. विश्वविद्यालय के एडवांस सेंटर ऑफ मशरूम रिसर्च की ओर से औषधीय मशरूम की विभिन्न प्रजातियों के उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन पर नियमित प्रशिक्षण एवं कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है. इसमें समस्तीपुर, दरभंगा, वैशाली, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर समेत कई जिलों के किसान और जीविका दीदियां भाग ले रही हैं.

पूसा कृषि विश्वविद्यालय

बिहार की जलवायु औषधीय मशरूम के लिए अनुकूल

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार बिहार की जलवायु हेरेशियम और शिटाके जैसी औषधीय मशरूम प्रजातियों की खेती के लिए बेहद उपयुक्त है. इन मशरूमों का उपयोग कैंसर, डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक माना जाता है. बाजार में इनकी कीमत 8 से 10 हजार रुपये प्रति किलोग्राम तक है, जो सामान्य मशरूम की तुलना में कई गुना अधिक है.

घर बैठे महिलाओं को मिलेगा रोजगार

मशरूम विशेषज्ञ डॉ. दयाराम ने बताया कि औषधीय मशरूम की खेती ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार का प्रभावी माध्यम बन सकती है. उन्होंने कहा कि इसके लिए बड़े खेत की जरूरत नहीं होती. घर के लगभग 10×10 फीट के कमरे में भी मशरूम उत्पादन शुरू किया जा सकता है. एक महिला हर महीने 30 से 40 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर सकती है. स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से इस खेती को अपनाने से गांवों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी.

बिहार को औषधीय मशरूम हब बनाने की तैयारी

एडवांस सेंटर ऑफ मशरूम रिसर्च के प्रभारी डॉ. आर.पी. प्रसाद ने बताया कि बिहार में अभी औषधीय मशरूम का उत्पादन बहुत कम है, जबकि देश और विदेश में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है. विश्वविद्यालय का लक्ष्य अगले दो वर्षों में बिहार को औषधीय मशरूम उत्पादन का प्रमुख केंद्र बनाना है. किसानों को स्पॉन उत्पादन, खेती, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग तक का प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाएगा.

60 से अधिक उत्पाद बनाकर कई गुना मुनाफा

डॉ. प्रसाद ने बताया कि औषधीय मशरूम से 60 से अधिक मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं. इससे किसानों को सामान्य खेती की तुलना में 4 से 5 गुना अधिक लाभ मिलने की संभावना है. उन्होंने कहा कि उत्तर बिहार का क्षेत्र इसके लिए सबसे अधिक उपयुक्त है और प्रशिक्षण के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जा सकता है.

प्रशिक्षण के लिए विश्वविद्यालय से करें संपर्क

विश्वविद्यालय ने इच्छुक किसानों, युवाओं और महिला स्वयं सहायता समूहों से अपील की है कि वे एडवांस सेंटर ऑफ मशरूम रिसर्च, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा से संपर्क कर प्रशिक्षण एवं तकनीकी सहायता प्राप्त करें.

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Purushottam Kumar

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