धमौन में नष्ट की गयी अफीम की फसल

Published at :13 Feb 2017 12:20 AM (IST)
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धमौन में नष्ट की गयी अफीम की फसल

कामयाबी. मामले में रोज हो रहे नये खुलासे, खेती मिलने के बाद चर्चाओं का बाजार गर्म शाहपुर पटोरी : अफीम की खेती का मामला उजागर होने के बाद प्रखंड क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म है. हर जगह एक ही जिक्र हो रहा है कि आखिर कब से इसकी खेती यहां हो रही है और […]

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कामयाबी. मामले में रोज हो रहे नये खुलासे, खेती मिलने के बाद चर्चाओं का बाजार गर्म

शाहपुर पटोरी : अफीम की खेती का मामला उजागर होने के बाद प्रखंड क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म है. हर जगह एक ही जिक्र हो रहा है कि आखिर कब से इसकी खेती यहां हो रही है और अबतक प्रशासन की नजर से कैसे बचे थे ? इसकी खेती करने वाले लोग आश्चर्यचकित भी हैं कि आखिर इतनी मात्र में इसकी खेती यहां कितने दिनों से हो रही थी, इन सवालों का जवाब हर कोई जानना चाहता है.
मामला उजागर होने के बाद लोग अपनी ही जमीन को पहचानने से इनकार कर रहे हैं, लेकिन इस समस्या का निदान करने में प्रशासन जुट चुका है. थानाध्यक्ष बीएन मेहता ने बताया कि जमीन मालिकों सूची सीओ को उपलब्ध कराने को कहा गया था, लेकिन अबतक उपलब्ध नहीं कराया जा सका है. इधर, एसडीओ राजेश कुमार ने बताया कि उन्होंने भी पटोरी सीओ से उन खेतों के वास्तविक मालिकों के नाम पुलिस को उपलब्ध हेतु कहा था, परंतु अबतक सीओ द्वारा इसे उपलब्ध नहीं कराया.
बार-बार स्मारित करने के बावजूद भी सीओ इसे गंभीरता से नहीं ले रहे हैं. एसडीओ ने बताया कि सीओ के इस कृत्य की जानकारी उच्चाधिकारियों को उपलब्ध करायी जा रही है तथा उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के लिए अधिकारियों को लिखा जा रहा है. इधर, दबी जुबान से कुछ ग्रामीणों ने बताया कि कुछ किसान अपनी भूमि को बटाईदार को देने की बात कह रहे हैं, लेकिन इसका कोई ठोस प्रमाण उनके पास नहीं है. जो पकड़ी गई फसल चिह्नित की गई है, कहीं उससे और अधिक फसल तो नहीं है.
प्रखंड क्षेत्र में यह भी चर्चा का विषय है. पिछले दो दिनों में लगभग पांच एकड़ फसल पकड़ी गयी है और अब भी प्रशासन की तलाश जारी है. रातोंरात कुछ किसानों ने फसल को नष्ट करने का भी प्रयास किया है, जिसकी पहचान भी प्रशासन द्वारा करायी जा रही है. लोगों की मानें तो लगभग छह वर्षों से इसकी खेती यहां हो रही है और करीब 50 करोड़ रुपये से अधिक की फसल पकड़ी जा चुकी है.
तैयार फसलों को भेजा जाता था दूसरे प्रदेश : कुछ ग्रामीणों ने बताया कि तैयार फसलों को बिहार से बाहर कई प्रदेशों में भेजा जाता था. बिहार से बाहर यथा पश्चिम बंगाल, ओडिसा, मध्य प्रदेश, उार प्रदेश व पंजाब आदि जगहों से व्यापारी यहां आते थे और पूरी की पूरी फसल को खरीद लेते हैं. ग्रामीणों ने बताया कि उन्हें तो लगता था कि यह मंगरैला या फूल की कोई नई प्रजाति है. इसलिए बाहर के व्यापारी यहां आकर इसे खरीदते थे.
मिलती थी ऊंची कीमत
नाम न छापने की शर्त पर लोगों ने बताया कि सबसे पहले गांव के एक-दो कृषकों ने इस खेती की शुरुआत की. जिस समय उन्होंने इस फसल लगाने की शुरुआत की, उस समय उनकी माली हालत कुछ ठीक नहीं थी. एक-दो वर्ष की खेती करने एवं उसे बेचने से उनकी उन्नति हो गयी. इसे देखते हुए कई और लोगों ने इसकी खेती शुरू कर दी. बाद में कुछ लोगों ने वेंडर का काम करना शुरू कर दिया. उनका काम था कि वे इस फसल को लगाने के लिए प्रेरित करते थे
और उसे बेचवाने का भी जिम्मा उठाते थे. इससे किसानों का झुकाव इस ओर हो गया कि उन्हें अपनी फसल को कहीं भी ले जाने की जरूरत नहीं थी और वहीं उनका माल बिक जाता था. कई ने बताया ने बताया कि उन्हें प्रति कट्ठे इस फसल को बेचने में छह से आठ हजार रुपये प्रति कट्ठे मिलते थे.
फसल नष्ट
लगातार मिल रही अफीम की फसल को नष्ट करने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गयी है. उक्त आशय की जानकारी देते हुए थानाध्यक्ष बीएन मेहता ने बताया कि पकड़ी गयी फसलों को ट्रैक्टर से जुतवाया जा रहा है. बाद में उसे एकत्र कर जलाकर नष्ट कर दिया जायेगा.
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