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जिले में एक भी सरकारी बीएड कॉलेज नहीं, छात्र-छात्राएं निजी संस्थानों पर हैं निर्भर

Updated at : 13 Dec 2025 5:38 PM (IST)
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जिले में एक भी सरकारी बीएड कॉलेज नहीं, छात्र-छात्राएं निजी संस्थानों पर हैं निर्भर

जिले में एक भी सरकारी बीएड कॉलेज नहीं, छात्र-छात्राएं निजी संस्थानों पर हैं निर्भर

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कोसी क्षेत्र का एकमात्र सरकारी अध्यापक शिक्षा महाविद्यालय की मान्यता पांच वर्ष पूर्व समाप्त अत्यधिक फीस देने को हो रहे विवश सहरसा . प्रमंडलीय मुख्यालय क्षेत्र में एकमात्र सरकारी अध्यापक शिक्षा महाविद्यालय की मान्यता पिछले पांच वर्ष पूर्व ही समाप्त हो गयी है. एनसीटीई द्वारा निर्धारित नियम व शर्तें पूरी नहीं किये जाने के कारण फिर से मान्यता अब तक नहीं मिली है. जिस कारण कोसी इलाके से बीएड करने के लिए छात्र-छात्राएं निजी या अन्य कॉलेजों में कई गुणा अधिक फीस जमा कर कोर्स कर रहे हैं. इसके बावजूद स्थानीय जनप्रतिनिधि इस महत्वपूर्ण संस्थान को फिर से मान्यता दिलाने के लिए कोई ठोस पहल करते नजर नहीं आ रहे हैं. जानकारी के अनुसार यह कॉलेज बिहार के छह सरकारी अध्यापक शिक्षा महाविद्यालयों में शामिल है. वर्ष 2019 में तत्कालीन प्राचार्य जयकांत पासवान ने एनसीटीई को समय पर जरूरी दस्तावेज नहीं भेजे. नये भवन संबंधित प्रमाण पत्र, शिक्षकों का फैकल्टी, अग्निशमन सेवा का प्रमाण पत्र जैसे जरूरी कागजात जमा नहीं करने के कारण एनसीटीई ने बीएड की मान्यता समाप्त कर दी. वर्ष 2021 से बीएड में नामांकन पूरी तरह बंद है. इसे कॉलेज प्रशासन की लापरवाही कहें या स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उदासीनता, खामियाजा गरीब छात्र-छात्रा भुगत रहे हैं. महंगे शुल्क देकर बीएड की पढ़ाई को मजबूर बच्चे इस कॉलेज में पहले गरीब एवं कमजोर वर्ग के छात्र, छात्रा कम खर्च में बीएड की पढ़ाई कर लेते थे. सामान्य कोटि के विद्यार्थियों को दो साल के कोर्स के लिए मात्र 24 हजार रुपये देने होते थे. वहीं एससी-एसटी कोटे के विद्यार्थियों को सिर्फ नौ हजार रुपये में कोर्स पूरा करने का मौका मिलता था. साथ ही उन्हें स्टाइपेंड भी मिलता था. अब इलाके के छात्र-छात्राओं को बीएड कोर्स करने के लिए निजी कॉलेजों में ढ़ाई से तीन लाख तक फीस चुकानी पड़ रही है. जिला स्थित अन्य कई कॉलेज में मंहगे शुल्क पर बीएड की पढ़ाई चल रही है. बावजूद अभी भी जितना मजबूत आधारिक संरचना एवं सुविधा सरकारी बीएड कॉलेज की है, उतनी अन्य किसी कॉलेज की नहीं है. ऐसे में कई लोग दबी जुबान से यह भी कह रहे हैं कि शिक्षा माफिया नहीं चाहता है कि सरकारी बीएड कॉलेज सस्ते शुल्क में छात्रों को बीएड कोर्स करने की सुविधा दे. इससे निजी कॉलेजों को नुकसान होगा. जानकारी के अनुसार वर्ष 1976 में बिहार सरकार ने जिला स्कूल परिसर के कुछ भवनों को अधिग्रहित कर इस कॉलेज की स्थापना हुई थी. तब इसे राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय कहा जाता था. उस समय एनसीटीई का गठन नहीं हुआ था. 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के कार्यकाल में नामांकन बंद कर दिया गया. 2012 में बीएड कोर्स की मिली थी मान्यता एनसीटीई का गठन 1995 में हुआ. इसके बाद कॉलेज को 2012-13 में एक सौ फ्रेशर छात्रों के लिए एक वर्षीय बीएड कोर्स की मान्यता मिली. 2015 में बिहार सरकार ने इसका नाम बदलकर अध्यापक शिक्षा महाविद्यालय कर दिया. 2016 में यह कॉलेज जिला स्कूल से हटाकर एक पुराने भवन में शिफ्ट किया गया. तत्कालीन प्राचार्य राणा जयराम सिंह के प्रयास से एनसीटीई ने भवन निर्माण के लिए 13 करोड़ 30 लाख रुपये स्वीकृत की. इसके बाद कॉलेज का नया भवन बना. लेकिन जैसे ही नया भवन मिला, मान्यता समाप्त हो गयी. अब यहां सिर्फ एमएड की पढ़ाई हो रही है व 50-50 प्रशिक्षु के प्रथम वर्ष एवं द्वितीय वर्ष के दो बैच चल रहे हैं. समस्या के समाधान के लिए हैं प्रयासरत : प्राचार्य अध्यापक शिक्षा महाविद्यालय के प्राचार्य सुरेंद्र कुमार ने बताया वे इस समस्या के समाधान के लिए प्रयासरत हैं. उन्होंने बताया कि बीएड के चार वर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्स के लिए अप्लाई किया गया है. जिसमें मल्टी डिसीप्लीनरी शर्त बाधक बन रहा है.बीएड के साथ यहां बीए, बीएससी, बीकॉम की पढ़ाई करने की शर्त है. अब नैक से एक्रेडिटेशन भी चाहिए. उन्होंने यह भी माना कि अब राज्य स्तर पर ही मान्यता की कोशिश हो सकती है एवं इसमें जनप्रतिनिधियों की सहभागिता जरूरी होगी. फिलहाल वर्ष 2023 से स्कूल शिक्षकों का सेवाकालीन प्रशिक्षण चल रहा है. ऐसे में बीएड मान्यता के लिए की जाने वाली कोशिश प्रभावित हो रही है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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